भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात में बड़ी कटौती की है। सरकार द्वारा जारी
दिसंबर 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, इस महीने रूस से भारत का कच्चा तेल आयात घटकर
2.7 अरब डॉलर रह गया। यह स्तर
फरवरी 2024 के बाद सबसे कम है और पिछले
38 महीनों में रिकॉर्ड की गई सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे मुख्य वजह अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंध हैं।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा था। रियायती कीमतों पर मिलने वाले रूसी क्रूड ने भारत को महंगे अंतरराष्ट्रीय बाजार से राहत दी थी। एक समय ऐसा भी था जब भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 35–40 फीसदी तक पहुंच गई थी। लेकिन दिसंबर 2025 के आंकड़े बताते हैं कि यह ट्रेंड अब बदलता नजर आ रहा है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते रूसी तेल की शिपिंग, बीमा और पेमेंट से जुड़ी दिक्कतें बढ़ी हैं। कई भारतीय रिफाइनरियों को लेन-देन में जोखिम नजर आने लगा है, जिसके कारण उन्होंने वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना शुरू कर दिया है। इसका सीधा असर आयात के आंकड़ों पर पड़ा है।
रूस से आयात घटने के साथ-साथ भारत ने मध्य-पूर्वी देशों जैसे इराक, सऊदी अरब और यूएई से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। इसके अलावा अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी सप्लाई में इजाफा देखा गया है। सरकार की रणनीति साफ है—तेल आपूर्ति को लेकर किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचना और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि रूस से तेल आयात में यह गिरावट स्थायी हो, यह जरूरी नहीं है। अगर वैश्विक राजनीतिक हालात या प्रतिबंधों की शर्तों में बदलाव होता है, तो भारत दोबारा रियायती रूसी तेल की ओर रुख कर सकता है। फिलहाल, भारत संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है—जहां एक ओर सस्ती ऊर्जा की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय दबाव और वित्तीय जोखिमों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर, दिसंबर 2025 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि वैश्विक भू-राजनीति का असर भारत की ऊर्जा नीति पर साफ दिखने लगा है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि भारत रूस से तेल आयात को लेकर अपनी रणनीति में और क्या बदलाव करता है।
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