देवभूमि
Uttarakhand अपनी आध्यात्मिक विरासत और प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। बद्रीनाथ-केदारनाथ से लेकर जागेश्वर तक यहां अनेकों तीर्थस्थल हैं, लेकिन रुद्रप्रयाग जिले की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित
कार्तिक स्वामी मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां सामान्य मंदिरों की तरह प्रतिमा की पूजा नहीं होती, बल्कि भगवान कार्तिकेय की
अस्थियों (हड्डियों) की पूजा की जाती है।
क्या है मान्यता?
यह मंदिर भगवान Kartikeya (जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन भी कहा जाता है) को समर्पित है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने पुत्रों कार्तिकेय और गणेश की परीक्षा ली। कार्तिकेय ने पिता के आदेश का पालन करते हुए अपनी अस्थियां अर्पित कर दीं। उनकी इस त्याग भावना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुनर्जीवित किया। माना जाता है कि उसी घटना की स्मृति में यहां उनकी अस्थियों की पूजा की जाती है।
360 डिग्री हिमालय दर्शन
यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए भक्तों को करीब 3 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है। मंदिर परिसर से चौखंबा, नीलकंठ और बंदरपूंछ जैसी हिमालय की चोटियों का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। प्रकृति और आध्यात्मिकता का यह संगम श्रद्धालुओं को विशेष अनुभव देता है।
आस्था और उत्सव
कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशेष मेले और पूजा का आयोजन होता है। दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोग इस मंदिर को अत्यंत पवित्र मानते हैं और मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य फल देती है।
क्यों है खास?
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प्रतिमा के बजाय अस्थियों की पूजा
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ऊंचाई पर स्थित रमणीय स्थल
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पौराणिक कथा से जुड़ी अद्वितीय परंपरा
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हिमालय का मनमोहक दृश्य
कार्तिक स्वामी मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी अनोखी परंपरा के कारण भी अलग पहचान रखता है। यह मंदिर त्याग, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। यदि आप उत्तराखंड की आध्यात्मिक यात्रा पर हैं, तो इस अनोखे धाम के दर्शन अवश्य करें।
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