भारत में एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस) संक्रमण को लेकर चिंता बनी हुई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार
Meghalaya में देश के मुकाबले प्रति जनसंख्या सबसे अधिक एचआईवी संक्रमण के मामले दर्ज किए गए हैं। यहां 10 हजार से अधिक लोग एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के तहत इलाज करा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, युवाओं और उच्च-जोखिम समूहों में संक्रमण की दर अपेक्षाकृत ज्यादा देखी जा रही है।
एचआईवी शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करता है और इलाज न होने पर यह एड्स (AIDS) में बदल सकता है। हालांकि समय पर जांच और नियमित दवाओं से संक्रमित व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है।
संक्रमण के खिलाफ जंग: दो बड़े अपडेट
लंबी अवधि तक असर करने वाली नई दवा
दुनियाभर में वैज्ञानिक ऐसी लॉन्ग-एक्टिंग एंटीरेट्रोवायरल इंजेक्शन थेरेपी पर काम कर रहे हैं, जिसे रोजाना गोली लेने के बजाय कुछ हफ्तों या महीनों में एक बार दिया जा सके। इससे मरीजों को नियमित दवा लेने की झंझट कम होगी और उपचार पालन (treatment adherence) बेहतर होगा। भारत में भी इस दिशा में क्लीनिकल रिसर्च और चरणबद्ध उपलब्धता पर काम जारी है।
रोकथाम के लिए प्री-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस (PrEP) का विस्तार
उच्च जोखिम वाले समूहों में संक्रमण रोकने के लिए PrEP (Pre-Exposure Prophylaxis) का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। यह ऐसी दवा है, जिसे एचआईवी-निगेटिव व्यक्ति संक्रमण के जोखिम को कम करने के लिए ले सकता है। स्वास्थ्य एजेंसियां जागरूकता अभियान के जरिए PrEP और नियमित जांच को बढ़ावा दे रही हैं।
रोकथाम के लिए क्या जरूरी?
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सुरक्षित यौन व्यवहार
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नियमित एचआईवी जांच
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सुई या इंजेक्शन साझा न करना
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गर्भवती महिलाओं की अनिवार्य जांच
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समय पर ART उपचार शुरू करना
भारत में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मुफ्त जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध है। जागरूकता, समय पर परीक्षण और आधुनिक उपचार पद्धतियों के जरिए एचआईवी संक्रमण को नियंत्रित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
मेघालय में बढ़ते मामलों ने चिंता जरूर बढ़ाई है, लेकिन नई दवाओं और रोकथाम उपायों से उम्मीद भी जगी है। यदि जांच, इलाज और जागरूकता अभियान तेज किए जाएं, तो संक्रमण की दर को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है।
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