विशेषज्ञों के मुताबिक, आउटडोर गेम्स सिर्फ शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं होते, बल्कि बच्चों के मानसिक विकास में भी अहम भूमिका निभाते हैं। जब बच्चे मैदान में खेलते हैं, तो उनका दिमाग स्क्रीन से हटकर वास्तविक दुनिया से जुड़ता है। इससे तनाव कम होता है, मूड बेहतर रहता है और नेगेटिव सोच पर नियंत्रण बना रहता है। खुले वातावरण में खेलना बच्चों को आज़ादी का एहसास देता है, जो उनके इमोशनल बैलेंस के लिए बेहद जरूरी है।
आजकल ज्यादातर बच्चे मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप में उलझे रहते हैं। ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया धीरे-धीरे उन्हें आभासी दुनिया में कैद कर देते हैं, जहां तुलना, परफेक्शन और फॉलोअर्स का दबाव मानसिक तनाव बढ़ाता है। इसके उलट आउटडोर गेम्स जैसे क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी, बैडमिंटन या सिर्फ दोस्तों के साथ दौड़ना-भागना बच्चों में टीमवर्क, धैर्य और आत्मविश्वास विकसित करता है।
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि रोजाना कम से कम 60 मिनट का फिजिकल एक्टिविटी टाइम बच्चों के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इससे एंग्जायटी, डिप्रेशन और चिड़चिड़ेपन जैसी समस्याओं का खतरा कम होता है। खेल के दौरान शरीर में एंडॉर्फिन हार्मोन रिलीज होता है, जिसे “हैप्पी हार्मोन” कहा जाता है, जो बच्चों को मानसिक रूप से खुश और रिलैक्स महसूस कराता है।
पेरेंट्स की भूमिका यहां सबसे अहम हो जाती है। बच्चों को सिर्फ मोबाइल से दूर रहने की सलाह देना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें खुद आउटडोर एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। परिवार के साथ पार्क जाना, वीकेंड पर खेल का समय तय करना और बच्चों की बातों को बिना जज किए सुनना उनके मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है।
गाजियाबाद जैसी घटनाएं हमें चेतावनी देती हैं कि बच्चों की दुनिया सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। आउटडोर गेम्स, खुली बातचीत और भावनात्मक सपोर्ट ही बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बना सकते हैं और उन्हें किसी भी गलत रास्ते पर जाने से रोक सकते हैं।
0 टिप्पणियाँ