Colorectal cancer: पेट की आम दिक्कत बन सकती है जानलेवा, 600% तक बढ़ सकता है खतरा


 पेट से जुड़ी कुछ समस्याओं को अक्सर लोग मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) से पीड़ित लोगों में आगे चलकर बाउल कैंसर का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना ज्यादा हो सकता है। कुछ अध्ययनों में यह जोखिम 600 प्रतिशत तक बढ़ने की बात कही गई है।

बाउल कैंसर को कोलन कैंसर या कोलोरेक्टल कैंसर भी कहा जाता है, जो बड़ी आंत (कोलन) या मलाशय (रेक्टम) को प्रभावित करता है।

क्या है इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD)?

IBD एक क्रॉनिक (लंबे समय तक रहने वाली) सूजन संबंधी बीमारी है, जिसमें पाचन तंत्र की आंतों में सूजन हो जाती है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं:

  • अल्सरेटिव कोलाइटिस

  • क्रोहन रोग

लंबे समय तक आंतों में बनी रहने वाली सूजन कोशिकाओं में बदलाव (म्यूटेशन) का कारण बन सकती है, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ता है।

क्यों बढ़ता है कैंसर का खतरा?

  • लगातार सूजन: क्रॉनिक इंफ्लेमेशन आंत की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है।

  • कोशिकाओं में असामान्य वृद्धि: बार-बार मरम्मत की प्रक्रिया के दौरान डीएनए में बदलाव हो सकता है।

  • बीमारी की लंबी अवधि: 8–10 साल से ज्यादा समय तक IBD रहने पर जोखिम और बढ़ जाता है।

किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

  • मल में खून आना

  • लगातार दस्त या कब्ज

  • पेट में तेज दर्द या ऐंठन

  • बिना कारण वजन घटना

  • अत्यधिक थकान

ये लक्षण IBD और कोलोरेक्टल कैंसर—दोनों में दिखाई दे सकते हैं, इसलिए समय रहते जांच जरूरी है।

बचाव और जांच

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि IBD से पीड़ित मरीज नियमित रूप से कोलोनोस्कोपी करवाएं। समय-समय पर स्क्रीनिंग से शुरुआती अवस्था में असामान्य कोशिकाओं की पहचान की जा सकती है।

संतुलित आहार, फाइबर का उचित सेवन, धूम्रपान से दूरी और डॉक्टर की निगरानी में दवा लेना जोखिम कम करने में मददगार हो सकता है।

निष्कर्ष

इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज को हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। यदि पेट से जुड़ी समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें। समय पर पहचान और नियमित जांच ही कोलोरेक्टल कैंसर के खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ