कौन हैं गलगोटिया यूनिवर्सिटी के मालिक? जीरो से खड़ा किया शिक्षा का साम्राज्य, अब चीनी रोबोट विवाद में नाम चर्चा में


 दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान सामने आए रोबोट डॉग विवाद ने ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया। ‘ओरियन’ नाम से प्रदर्शित एक रोबोट को विश्वविद्यालय की उपलब्धि बताया गया, लेकिन बाद में पता चला कि वह एक चीनी कंपनी का उत्पाद था। इसके बाद समिट आयोजकों ने विश्वविद्यालय को कार्यक्रम से बाहर कर दिया और मामला सुर्खियों में आ गया।

कौन हैं मालिक?

गलगोटिया यूनिवर्सिटी के संस्थापक और प्रमुख चेहरा सुनील गलगोटिया हैं। वे एक शिक्षा उद्यमी के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों से शुरुआत कर आज एक बड़े शैक्षणिक समूह की स्थापना की। उनका परिवार लंबे समय से शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा रहा है और उन्होंने उत्तर प्रदेश में निजी उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सुनील गलगोटिया ने वर्ष 2011 में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की स्थापना की। इससे पहले गलगोटिया ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के माध्यम से इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज संचालित किए जा रहे थे। धीरे-धीरे इस समूह ने तकनीकी, प्रबंधन, फार्मेसी, लॉ और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में अपनी उपस्थिति मजबूत की। आज विश्वविद्यालय में देश-विदेश से हजारों छात्र पढ़ाई कर रहे हैं।

जीरो से साम्राज्य तक का सफर

गलगोटिया समूह की शुरुआत छोटे स्तर पर हुई थी, लेकिन समय के साथ संस्थान ने इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्री टाई-अप और प्लेसमेंट के क्षेत्र में निवेश बढ़ाया। निजी विश्वविद्यालयों की बढ़ती मांग और तकनीकी शिक्षा के विस्तार ने भी संस्थान को तेजी से आगे बढ़ने का अवसर दिया। यही वजह है कि कुछ ही वर्षों में यह उत्तर भारत के प्रमुख निजी विश्वविद्यालयों में गिना जाने लगा।

क्या है रोबोट विवाद?

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में विश्वविद्यालय के स्टॉल पर ‘ओरियन’ नाम से एक रोबोट डॉग प्रदर्शित किया गया। दावा किया गया कि यह संस्थान की इनोवेशन का हिस्सा है। हालांकि जांच में सामने आया कि वह उत्पाद एक चीनी कंपनी द्वारा निर्मित था। इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठे और समिट आयोजकों ने विश्वविद्यालय की भागीदारी समाप्त कर दी।

विवाद बढ़ने पर विश्वविद्यालय ने स्पष्टीकरण जारी कर इसे प्रतिनिधि की चूक बताया और सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। हालांकि, इस घटनाक्रम ने संस्थान की साख और उसके नेतृत्व पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि विश्वविद्यालय भविष्य में पारदर्शिता और विश्वसनीयता को कैसे मजबूत करता है।

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