फेफड़ों का कैंसर आज दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में से एक माना जाता है। World Cancer Day के मौके पर इस बीमारी को लेकर जागरूकता और भी जरूरी हो जाती है। आमतौर पर फेफड़ों के कैंसर को तंबाकू और धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि तंबाकू का सेवन न करने वाले लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हर साल फेफड़ों के कैंसर के करीब एक लाख नए मामले सामने आते हैं, जिनमें एक बड़ा हिस्सा नॉन-स्मोकर्स का भी होता है।
फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण
फेफड़ों के कैंसर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य बीमारियों जैसे लगते हैं, जिससे लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं।
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लंबे समय तक रहने वाली खांसी या खांसी का लगातार बढ़ते जाना
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सांस लेने में दिक्कत या सीने में भारीपन
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सीने में लगातार दर्द या जकड़न
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खांसी के साथ खून आना
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बार-बार इन्फेक्शन होना, जैसे निमोनिया या ब्रोंकाइटिस
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अचानक वजन कम होना और लगातार थकान महसूस होना
अगर ये लक्षण हफ्तों तक बने रहें, तो इन्हें हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है।
तंबाकू न खाने वालों को क्यों हो रहा है फेफड़ों का कैंसर?
विशेषज्ञों के अनुसार, फेफड़ों के कैंसर के पीछे सिर्फ तंबाकू ही जिम्मेदार नहीं है।
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एयर पॉल्यूशन: शहरों में बढ़ता प्रदूषण फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।
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सेकेंड हैंड स्मोक: खुद न पीने के बावजूद दूसरों के धुएं के संपर्क में रहना भी जोखिम बढ़ाता है।
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केमिकल्स और जहरीली गैसें: फैक्ट्रियों, कंस्ट्रक्शन साइट्स और इंडस्ट्रियल इलाकों में काम करने वाले लोग ज्यादा जोखिम में रहते हैं।
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जेनेटिक कारण: परिवार में किसी को कैंसर रहा हो, तो खतरा बढ़ सकता है।
समय पर पहचान क्यों है जरूरी?
फेफड़ों के कैंसर का इलाज शुरुआती स्टेज में संभव और ज्यादा प्रभावी होता है। लेकिन देर से पहचान होने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। यही वजह है कि डॉक्टर लगातार अर्ली स्क्रीनिंग और लक्षणों पर ध्यान देने की सलाह देते हैं।
बचाव के लिए क्या करें?
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धूम्रपान और तंबाकू से पूरी तरह दूरी
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ज्यादा प्रदूषण में मास्क का इस्तेमाल
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हेल्दी डाइट और नियमित एक्सरसाइज
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किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से सलाह
निष्कर्ष
फेफड़ों का कैंसर सिर्फ स्मोकर्स की बीमारी नहीं रह गई है। बदलती जीवनशैली और पर्यावरण के कारण यह खतरा हर किसी के लिए बढ़ रहा है। World Cancer Day पर सबसे बड़ा संदेश यही है—लक्षणों को नजरअंदाज न करें, समय पर जांच कराएं और जागरूक रहें, क्योंकि शुरुआती पहचान ही जीवन बचा सकती है।
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