अल्जाइमर का डर सता रहा है? वैज्ञानिकों ने बताए पहचान के दो कारगर तरीके




 दिमाग से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है, खासकर उम्र बढ़ने के साथ। Alzheimer's disease डिमेंशिया का सबसे प्रमुख कारण है, जिसमें दिमाग में असामान्य प्रोटीन—एमाइलॉइड (Amyloid) और टाउ (Tau)—जमा होने लगते हैं। ये प्रोटीन न्यूरॉन्स को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे याददाश्त कमजोर होती है, निर्णय लेने की क्षमता घटती है और व्यक्ति परिचित चेहरों को पहचानने में भी कठिनाई महसूस कर सकता है।

हाल के वैज्ञानिक शोधों में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान के दो प्रभावी तरीकों पर खास जोर दिया गया है:

 रक्त जांच (ब्लड बायोमार्कर टेस्ट)

पहले अल्जाइमर की पुष्टि के लिए जटिल और महंगे टेस्ट—जैसे ब्रेन स्कैन या स्पाइनल फ्लूइड जांच—की जरूरत पड़ती थी। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने ऐसे रक्त परीक्षण विकसित किए हैं, जो खून में एमाइलॉइड और टाउ प्रोटीन के स्तर का पता लगा सकते हैं।

ये ब्लड बायोमार्कर टेस्ट शुरुआती चरण में ही बीमारी के संकेत दे सकते हैं, जिससे समय रहते इलाज और जीवनशैली में बदलाव संभव हो पाता है। यह तरीका कम खर्चीला और ज्यादा सुलभ माना जा रहा है।

 ब्रेन इमेजिंग (PET स्कैन)

दूसरा प्रभावी तरीका है पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (PET) स्कैन। इस तकनीक से दिमाग में जमा एमाइलॉइड प्लाक और टाउ प्रोटीन की स्पष्ट तस्वीर मिलती है। इससे डॉक्टर यह समझ पाते हैं कि दिमाग के कौन से हिस्से प्रभावित हो रहे हैं।

हालांकि यह तरीका अधिक सटीक है, लेकिन महंगा होने के कारण हर मरीज के लिए तुरंत उपलब्ध नहीं होता।

किन लक्षणों पर दें ध्यान?

  • बार-बार चीजें भूलना

  • परिचित रास्ते या लोगों को पहचानने में दिक्कत

  • बातचीत में शब्द खोजने में परेशानी

  • निर्णय लेने की क्षमता में कमी

  • मूड और व्यवहार में बदलाव

यदि ये लक्षण लगातार बढ़ रहे हों, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।

क्या किया जा सकता है बचाव के लिए?

वैज्ञानिक मानते हैं कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, मानसिक गतिविधियां (जैसे पढ़ना, पहेलियां हल करना), अच्छी नींद और सामाजिक संपर्क अल्जाइमर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं।

हालांकि इस बीमारी का अभी पूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन शुरुआती पहचान से इसकी प्रगति को धीमा किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर रखी जा सकती है।

निष्कर्ष

अल्जाइमर का डर स्वाभाविक है, लेकिन घबराने की बजाय जागरूक रहना ज्यादा जरूरी है। आधुनिक विज्ञान की मदद से अब शुरुआती पहचान संभव हो रही है। सही समय पर जांच और जीवनशैली में सुधार से इस गंभीर बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

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