भारत और Israel के रिश्ते आज रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी सहयोग के मजबूत आधार पर खड़े हैं। लेकिन यह संबंध हमेशा इतने सहज नहीं थे। आज़ादी के शुरुआती दशकों में भारत का रुख इज़राइल को लेकर सावधानीपूर्ण और कई बार आलोचनात्मक भी रहा।
नेहरू और इज़राइल के गठन का विरोध
1948 में जब इज़राइल का गठन हुआ, तब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इसके विभाजन प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru और महात्मा गांधी का मानना था कि फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर यहूदी राष्ट्र का गठन अरब आबादी की अनदेखी करके नहीं होना चाहिए। भारत की विदेश नीति उस समय गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद-विरोध और अरब देशों के साथ एकजुटता पर आधारित थी। साथ ही, देश की बड़ी मुस्लिम आबादी और पश्चिम एशिया से ऊर्जा संबंधी हित भी एक महत्वपूर्ण कारण थे।
हालांकि 1950 में भारत ने औपचारिक रूप से इज़राइल को मान्यता दे दी, लेकिन दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए गए। इज़राइल का वाणिज्य दूतावास मुंबई में सीमित स्तर पर कार्य करता रहा, परंतु नई दिल्ली और तेल अवीव में दूतावास खोलने में चार दशक लग गए।
60 साल तक कोई प्रधानमंत्री इज़राइल क्यों नहीं गया?
आजादी के बाद करीब छह दशकों तक कोई भारतीय प्रधानमंत्री इज़राइल की आधिकारिक यात्रा पर नहीं गया। इसकी प्रमुख वजह भारत की ‘प्रो-फिलिस्तीन’ नीति और अरब देशों के साथ संतुलन बनाए रखने की कूटनीतिक जरूरत थी। भारत लंबे समय तक फ़िलिस्तीनी मुद्दे का समर्थक रहा और उसने Palestine Liberation Organization (PLO) को भी मान्यता दी थी।
रिश्तों में बदलाव: 1992 के बाद नई शुरुआत
शीत युद्ध की समाप्ति और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच 1992 में भारत ने इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। इसके बाद रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और तकनीक के क्षेत्रों में सहयोग तेज़ी से बढ़ा। कारगिल युद्ध (1999) के दौरान इज़राइल ने भारत को महत्वपूर्ण सैन्य सहायता प्रदान की, जिससे दोनों देशों के संबंधों में भरोसा और गहराया।
ऐतिहासिक मोड़: 2017 की प्रधानमंत्री यात्रा
2017 में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इज़राइल की ऐतिहासिक यात्रा की। यह पहली बार था जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री इज़राइल गया। इस यात्रा ने संबंधों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिलाया। इसके बाद कृषि नवाचार, साइबर सुरक्षा, रक्षा तकनीक और स्टार्टअप सहयोग में उल्लेखनीय प्रगति हुई।
आज के संबंध: मजबूत और बहुआयामी
आज भारत-इज़राइल संबंध रक्षा खरीद, संयुक्त अनुसंधान, ड्रोन और मिसाइल तकनीक, जल संरक्षण और कृषि नवाचार तक फैले हुए हैं। दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों और सुरक्षा चुनौतियों के संदर्भ में एक-दूसरे के महत्वपूर्ण साझेदार बन चुके हैं।
विरोध से विश्वास तक का यह सफर भारत-इज़राइल रिश्तों की जटिल लेकिन परिपक्व कूटनीति का उदाहरण है।
0 टिप्पणियाँ