बांग्लादेश में कब-कब हुआ जनमत संग्रह? इस बार कितना अलग है, क्या यूनुस बनेंगे ताकतवर?


 बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में जनमत संग्रह (Referendum) अब तक बहुत बार नहीं हुए हैं, लेकिन जो हुए हैं उनका देश की शासन व्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। 2026 का जनमत संग्रह चौथा राष्ट्रीय जनमत संग्रह माना जा रहा है, और यह वर्तमान राजनीतिक माहौल तथा संविधान सुधार के सवालों पर केंद्रित है।

 बांग्लादेश में अब तक के जनमत संग्रह — एक संक्षिप्त इतिहास

बांग्लादेश ने पहला जनमत संग्रह 30 मई 1977 को कराया था। उस समय देश में राष्ट्रपति जियाउर रहमान ने जनता से पूछा कि क्या वे उनके नेतृत्व और नीतियों का समर्थन करते हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक लगभग 98% मतदाताओं ने “हां” में मतदान किया था।

दूसरा जनमत संग्रह 21 मार्च 1985 में हुआ था, जब राष्ट्रपति एच.एम. एरशाद ने जनता से यह पूछे जाने पर वोट मांगा कि क्या वे उनकी नीतियों का समर्थन करते हैं और चाहेंगे कि वे चुनाव तक शासन करते रहें। इसमें भी भारी बहुमत “हां” में गया था।

तीसरा जनमत संग्रह 15 सितंबर 1991 में आयोजित किया गया। इस बार सवाल संविधान के 12वें संशोधन को स्वीकार करने पर था, जिससे राष्ट्रपति शासन की जगह संसदीय व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया जा सके। इस जनमत संग्रह में करीब 84% लोगों ने समर्थन किया।

इन तीनों जनमत संगठनों में से पहले दो तब हुए जब देश में सैन्य-समर्थित शासन चल रहा था, इसलिए उनके नतीजों पर अक्सर प्रश्न उठते रहे हैं।

 2026 का जनमत संग्रह — क्यों खास है?

अब बांग्लादेश में चौथा राष्ट्रीय जनमत संग्रह 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के साथ ही हो रहा है। इसका उद्देश्य जनता से यह पूछना है कि वे ‘जुलाई चार्टर (July Charter)’ नाम के प्रस्तावित 47 बड़े बदलाव को लागू करना चाहते हैं या नहीं।

यह जुलाई चार्टर एक विस्तृत संविधान सुधार प्रावधान है, जिसमें शामिल हैं:

  • संसद को दो सदनों वाला बनाना

  • प्रधानमंत्री की शक्तियों को सीमित करना

  • राष्ट्रपति के अधिकारों में बदलाव

  • न्यायपालिका और चुनाव आयोग के नियमों में संशोधन जैसे गंभीर परिवर्तन

  • संवैधानिक बदलावों के लिए एक सुधार परिषद का गठन
    ये बदलाव बांग्लादेश की राजनीतिक और शासन प्रणाली की दिशा बदल सकते हैं।

उन प्रमुख अंतर में से एक यह है कि पहले आमतौर पर संसद में संशोधन के बाद ही जनता से मत मांगा जाता था, लेकिन इस बार पहले जनमत संग्रह कराया जा रहा है और संशोधन प्रक्रिया उसके बाद शुरू होगी, अगर लोगों ने “हां” में वोट दिया तो।

वर्तमान प्रक्रिया में केवल एक ही सवाल पर “हां” या “ना” का वोट होना है, जबकि 47 बदलाव हैं। आलोचक इसे राजनीतिक रूप से विवादास्पद मानते हैं क्योंकि लोगों को विकल्प के रूप में अलग-अलग प्रस्तावों पर मतदान करने का मौका नहीं मिला है।

 क्या यूनुस इससे ताकतवर बनेंगे?

अब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस हैं, जिन्होंने संविधान सुधार और चुनाव एक साथ कराने की पहल की है। अगर इस जनमत संग्रह में “हां” बहुमत आता है, तो संशोधन प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और नई संवैधानिक व्यवस्था के लिए सुधार परिषद गठित होगी, जिससे यूनुस तथा उनकी नीतियों की भूमिका और अधिक निर्णायक हो सकती है

अंततः यह जनमत संग्रह देश की राजनीतिक दिशा तय कर सकता है — क्या बांग्लादेश एक नए संवैधानिक ढांचे के साथ आगे बढ़ेगा और मौजूदा व्यवस्था को बदलेगा, या वर्तमान संविधान बरकरार रहेगा

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