ओपनएआई की अमेरिकी सरकार को हां, एंथ्रोपिक ने ठुकराई मांग; युद्ध में AI पर वैश्विक बहस तेज


 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सैन्य इस्तेमाल को लेकर वैश्विक बहस और गहरा गई है। एक ओर OpenAI ने अमेरिकी रक्षा विभाग यानी Pentagon के साथ अपने एडवांस एआई मॉडल साझा करने का बड़ा समझौता किया है, तो दूसरी ओर Anthropic ने सरकार की कुछ शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ओपनएआई ने राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के मद्देनज़र अपनी तकनीक उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है। माना जा रहा है कि इस सहयोग का उद्देश्य सैन्य डेटा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक निर्णय-निर्माण को बेहतर बनाना है। कंपनी का तर्क है कि जिम्मेदार ढांचे और निगरानी के साथ एआई का इस्तेमाल सुरक्षा तंत्र को मजबूत कर सकता है।

वहीं एंथ्रोपिक ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी तकनीक का उपयोग आम नागरिकों की व्यापक निगरानी (mass surveillance) या बिना इंसानी नियंत्रण वाले घातक हथियारों के लिए नहीं होने देगी। कंपनी का कहना है कि एआई सिस्टम को मानव नियंत्रण और नैतिक दिशानिर्देशों के भीतर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। एंथ्रोपिक पहले भी ‘सेफ्टी-फर्स्ट’ अप्रोच पर जोर देती रही है।

प्राइवेसी और स्वायत्त हथियारों पर चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि एआई का सैन्य उपयोग दो बड़ी चिंताओं को जन्म देता है—पहली, नागरिकों की निजता पर खतरा; और दूसरी, ऐसे स्वायत्त हथियारों का विकास जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के निर्णय ले सकें। यदि एआई सिस्टम को पूरी तरह स्वचालित युद्धक निर्णयों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर और अनियंत्रित हो सकते हैं।

एंथ्रोपिक का तर्क है कि तकनीक का अनियंत्रित सैन्यीकरण वैश्विक स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। वहीं ओपनएआई का मानना है कि यदि लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर, स्पष्ट नियमों और जवाबदेही के साथ एआई का उपयोग हो, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने का साधन बन सकता है।

वैश्विक नीति पर असर

यह घटनाक्रम केवल दो कंपनियों का मतभेद नहीं, बल्कि भविष्य की एआई नीति का संकेत भी है। क्या सरकारें राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कंपनियों से पूर्ण सहयोग की अपेक्षा करेंगी? या फिर कंपनियां नैतिक सीमाएं तय कर अपनी शर्तों पर तकनीक साझा करेंगी?

स्पष्ट है कि एआई और युद्ध का सवाल अब तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले समय में यह बहस तय करेगी कि दुनिया में एआई का इस्तेमाल किस दिशा में आगे बढ़ेगा—सुरक्षा के लिए या संभावित खतरे के रूप में।

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