क्या सोशल मीडिया बच्चों के लिए उतना ही खतरनाक होता जा रहा है, जितना कभी सिगरेट को माना गया था? इसी सवाल को केंद्र में रखकर ब्रिटेन में एक तीखी राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। एक प्रमुख पेरेंटिंग प्लेटफॉर्म ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग करते हुए अभियान शुरू किया है।
अभियान चलाने वालों का तर्क है कि जिस तरह सिगरेट के पैकेट पर स्वास्थ्य चेतावनी (warning label) अनिवार्य की गई थी, उसी तरह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्पष्ट चेतावनियां होनी चाहिए। उनका कहना है कि लगातार स्क्रीन टाइम, ऑनलाइन बुलिंग, बॉडी-इमेज प्रेशर और एल्गोरिदमिक कंटेंट बच्चों के मानसिक विकास पर गंभीर असर डाल रहे हैं।
क्यों उठी बैन की मांग?
अभिभावकों का कहना है कि 13–15 साल के बच्चों में चिंता (anxiety), अवसाद (depression) और आत्म-सम्मान से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। वे मानते हैं कि सोशल मीडिया कंपनियां एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए ऐसे एल्गोरिद्म इस्तेमाल करती हैं, जो बच्चों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म से जोड़े रखते हैं।
ब्रिटेन में पहले से ही ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त कानून लागू किए जा रहे हैं, लेकिन अब मांग है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रखा जाए या कम से कम सख्त आयु-पुष्टि (age verification) लागू की जाए।
‘सिगरेट’ से तुलना क्यों?
सिगरेट पर चेतावनी लेबल लगाने का उद्देश्य लोगों को संभावित खतरे से आगाह करना था। अभियान से जुड़े लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया भी ‘डिजिटल लत’ (digital addiction) पैदा कर सकता है, जो मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए प्लेटफॉर्म्स पर स्पष्ट चेतावनी, उपयोग समय सीमा और सख्त निगरानी जरूरी है।
प्लेटफॉर्म्स की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया कंपनियों का तर्क है कि वे पहले ही पैरेंटल कंट्रोल, स्क्रीन टाइम लिमिट और सेफ्टी टूल्स जैसी सुविधाएं दे रही हैं। उनका कहना है कि पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय जागरूकता और डिजिटल शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए।
आगे क्या?
यह बहस केवल ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है। सवाल यह है कि क्या सरकारें सिगरेट की तरह सोशल मीडिया पर भी सख्त चेतावनी और प्रतिबंध लागू करेंगी, या संतुलित नियमन का रास्ता अपनाया जाएगा?
स्पष्ट है कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा अब एक बड़ा नीतिगत मुद्दा बन चुका है, और आने वाले समय में इस पर और कड़े फैसले देखने को मिल सकते हैं।
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