भारत 14 से 16 जनवरी तक राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन (कॉमनवेल्थ स्पीकर्स एंड प्रेसिडिंग ऑफिसर्स कॉन्फ्रेंस—CSPOC) की मेजबानी कर रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 42 देशों के संसदों के अध्यक्ष, पीठासीन अधिकारी और वरिष्ठ प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय लोकतंत्र की मजबूती, उसकी प्रभावी डिलीवरी और जनहित में उसके सतत विकास पर व्यापक विचार रखे।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के लिए यह गौरव की बात है कि चौथी बार CSPOC का आयोजन देश में हो रहा है। इससे पहले भी भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा विविधताओं से भरी रही है, लेकिन संवाद, सहमति और संवैधानिक मूल्यों ने इसे मजबूती प्रदान की है।
इस वर्ष सम्मेलन का मुख्य विषय “संसदीय लोकतंत्र की प्रभावी डिलीवरी” रखा गया है। इस पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनभागीदारी, जवाबदेही और पारदर्शिता का सतत अभ्यास है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संसदें तभी प्रभावी होती हैं, जब वे नागरिकों की आकांक्षाओं को नीति निर्माण और कानूनों के माध्यम से धरातल पर उतार सकें।
प्रधानमंत्री ने तकनीक की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल नवाचारों के माध्यम से संसदों को अधिक सुलभ, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकता है। ई-गवर्नेंस, डिजिटल रिकॉर्ड्स और ऑनलाइन सहभागिता जैसे कदम लोकतांत्रिक संस्थानों की कार्यकुशलता बढ़ाते हैं। साथ ही, उन्होंने युवा पीढ़ी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
पीएम मोदी ने राष्ट्रमंडल देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने का आह्वान करते हुए कहा कि साझा चुनौतियों—जैसे जलवायु परिवर्तन, सामाजिक असमानता और वैश्विक अनिश्चितता—का समाधान मिलकर ही संभव है। संसदें इन विषयों पर नीति-निर्माण और निगरानी में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के साथ लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। CSPOC जैसे मंच विचारों के आदान-प्रदान, सर्वोत्तम प्रथाओं के साझा करने और वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह सम्मेलन न केवल संसदीय लोकतंत्र की दिशा तय करता है, बल्कि आने वाले समय में वैश्विक सहयोग की नई राहें भी खोलता है।
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