बताया जा रहा है कि मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग खुद एआई प्रोजेक्ट्स की धीमी प्रगति और शुरुआती फेलियर से काफी नाराज थे। इसी नाराजगी ने कंपनी के भीतर बड़े स्तर पर बदलावों को जन्म दिया। टीम स्ट्रक्चर बदला गया, रिसर्च यूनिट्स को दोबारा संगठित किया गया और टॉप टैलेंट को एआई डिविजन में शिफ्ट किया गया। इसका नतीजा अब सामने आने लगा है।
एंड्रयू बोसवर्थ के मुताबिक, सुपरइंटेलिजेंस लैब का मकसद सिर्फ मौजूदा एआई मॉडल्स को बेहतर बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे सिस्टम तैयार करना है जो इंसानी स्तर की समझ और उससे आगे की क्षमताओं पर काम कर सकें। उन्होंने कहा कि ये नए इंटरनल मॉडल फिलहाल पब्लिक के लिए उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन भविष्य में इन्हीं के आधार पर मेटा के बड़े एआई प्रोडक्ट्स लॉन्च किए जाएंगे।
मेटा की यह वापसी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि बीते कुछ समय से एआई की दुनिया में गूगल और ओपनएआई का दबदबा साफ दिख रहा था। चैटजीपीटी और जेमिनी जैसे टूल्स ने बाजार में मजबूत पकड़ बना ली थी, जबकि मेटा के कुछ एआई प्रयोग अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए थे। लेकिन अब कंपनी का दावा है कि उसके नए मॉडल्स इन दिग्गजों को कड़ी टक्कर देने की क्षमता रखते हैं।
बोसवर्थ ने यह भी संकेत दिया कि मेटा एआई को सिर्फ चैटबॉट या सोशल मीडिया फीचर्स तक सीमित नहीं रखा जाएगा। आने वाले समय में एआई का इस्तेमाल वर्चुअल रियलिटी, ऑगमेंटेड रियलिटी, मेटावर्स और एडवांस कंटेंट क्रिएशन टूल्स में बड़े पैमाने पर किया जाएगा। इससे मेटा के बिजनेस मॉडल और यूजर एक्सपीरियंस दोनों में बड़ा बदलाव आ सकता है।
कुल मिलाकर, मेटा की यह ‘धमाकेदार वापसी’ दिखाती है कि एआई की दौड़ में कंपनी पीछे हटने के मूड में नहीं है। मार्क जुकरबर्ग की सख्ती और आक्रामक रणनीति अब रंग लाती दिख रही है, और आने वाले महीनों में मेटा एआई की दुनिया में एक बार फिर बड़ा खिलाड़ी बनकर उभर सकता है।
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