मद्रास हाईकोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम के दौरान दीप जलाने की अनुमति को बरकरार रखते हुए एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल कानून-व्यवस्था की आशंका के आधार पर धार्मिक परंपराओं को रोका नहीं जा सकता। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला
थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित एक दरगाह के पास ‘दीपथून’ नामक स्थान पर हर साल कार्तिगई दीपम पर्व के दौरान दीप जलाने की परंपरा रही है। इस वर्ष भी स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की ओर से दीप जलाने की अनुमति मांगी गई थी। इस पर मद्रास हाईकोर्ट की एकल न्यायाधीश पीठ ने दीप जलाने की इजाजत दे दी थी।
राज्य सरकार ने क्यों किया विरोध
राज्य सरकार ने इस आदेश का विरोध करते हुए कहा कि दीप जलाने से क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि अलग-अलग धार्मिक समुदायों की आस्था जुड़ी होने के कारण तनाव पैदा होने की आशंका है, इसलिए पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराना संभव नहीं होगा।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, न कि किसी धार्मिक गतिविधि पर रोक लगाने का कारण। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर हर बार संभावित तनाव का हवाला देकर परंपराओं को रोका जाएगा, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
सुरक्षा देने से इनकार पर सवाल
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार सुरक्षा देने से इनकार नहीं कर सकती, जब तक कि किसी गतिविधि पर स्पष्ट कानूनी रोक न हो। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान हो और शांति बनी रहे।
फैसले का महत्व
यह फैसला केवल थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल माना जा रहा है। कोर्ट का यह रुख बताता है कि धार्मिक आयोजनों को अनुमति देना और सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है, न कि उसे टालने का विकल्प।
आगे क्या
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब प्रशासन को दीप जलाने की परंपरा के दौरान पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी। साथ ही, सभी पक्षों से शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील भी की गई है।
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