China Mediation Claim Row: भारत-पाक संघर्ष पर चीन के दावे का पाकिस्तान ने किया समर्थन, MEA ने दिखाया आईना


 भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद घोषित संघर्षविराम को लेकर कूटनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इस बीच चीन द्वारा भारत-पाक के बीच मध्यस्थता करने के दावे पर नया विवाद खड़ा हो गया है। पाकिस्तान ने चीन के इस दावे का समर्थन किया है, जबकि भारत ने इसे सिरे से खारिज करते हुए दो टूक जवाब दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत-पाक के बीच किसी भी तरह की बातचीत या निर्णय पूरी तरह द्विपक्षीय होते हैं, इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं होती।

दरअसल, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान और उसके बाद सीमा पर हालात तनावपूर्ण हो गए थे। इसके बाद संघर्षविराम की घोषणा हुई, जिस पर चीन की ओर से यह दावा किया गया कि उसने दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में मध्यस्थता की भूमिका निभाई। पाकिस्तान ने इस बयान का समर्थन करते हुए कहा कि चीन ने क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए सकारात्मक प्रयास किए हैं।

पाकिस्तान के इस रुख को कई विश्लेषक उसकी पारंपरिक रणनीति के तौर पर देख रहे हैं, जिसमें वह भारत-पाक मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की कोशिश करता रहा है। चीन और पाकिस्तान के करीबी रिश्तों को देखते हुए इस समर्थन को भी उसी कड़ी में जोड़ा जा रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ी शक्तियों की भूमिका जरूरी है।

हालांकि भारत ने इस पूरे दावे को सख्ती से नकार दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत की नीति हमेशा से स्पष्ट रही है कि पाकिस्तान से जुड़े सभी मुद्दे द्विपक्षीय हैं और इन्हें किसी तीसरे देश की मध्यस्थता की जरूरत नहीं है। MEA ने यह भी दोहराया कि संघर्षविराम से जुड़े फैसले सीधे सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संवाद का परिणाम थे।

भारत का यह रुख कोई नया नहीं है। शिमला समझौते और बाद की कई घोषणाओं में यह साफ किया जा चुका है कि भारत-पाक के बीच विवादों का समाधान केवल आपसी बातचीत से ही संभव है। ऐसे में चीन की मध्यस्थता के दावे को भारत ने “तथ्यों से परे” बताया है।

कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे क्षेत्रीय राजनीति और शक्ति संतुलन का बड़ा खेल भी है। चीन, दक्षिण एशिया में अपनी भूमिका को बढ़ाने की कोशिश करता रहा है, जबकि भारत ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध करता है जो उसकी संप्रभु नीति के खिलाफ हो।

कुल मिलाकर, चीन के दावे को पाकिस्तान का समर्थन और भारत की सख्त प्रतिक्रिया एक बार फिर यह दिखाती है कि भारत-पाक संबंधों से जुड़े मुद्दे कितने संवेदनशील हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह कूटनीतिक बयानबाजी आगे किस दिशा में जाती है और क्षेत्रीय राजनीति पर इसका क्या असर पड़ता है

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