मार्क कार्नी ने कहा कि वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जो प्रणाली द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी थी, वह अब तेजी से टूट रही है। उन्होंने इशारों-इशारों में यह आरोप लगाया कि कुछ शक्तिशाली देश आर्थिक नीतियों, खासकर टैरिफ (शुल्क) को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। कार्नी के अनुसार, टैरिफ अब केवल व्यापार संतुलन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक दबाव और रणनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
कनाडाई प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि जब व्यापार नियमों का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल होता है, तो इससे वैश्विक भरोसा कमजोर होता है और आर्थिक अस्थिरता बढ़ती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की नीतियां न केवल छोटे और विकासशील देशों को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी दीर्घकालिक खतरा बन सकती हैं।
हालांकि कार्नी ने अमेरिका का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ तौर पर हाल के वर्षों में अपनाई गई अमेरिकी व्यापार नीतियों की ओर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बयान उस बढ़ते असंतोष को दर्शाता है, जो कई देशों में एकतरफा टैरिफ, संरक्षणवाद और वैश्विक संस्थाओं को कमजोर करने की प्रवृत्ति को लेकर है।
कार्नी ने यह भी कहा कि दुनिया अब बहुध्रुवीय (Multipolar World) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां किसी एक देश का दबदबा नहीं होगा। उनके मुताबिक, आने वाला समय सहयोग, नियम-आधारित व्यापार और साझा जिम्मेदारियों का होना चाहिए, न कि दबाव और प्रतिबंधों का।
दावोस मंच से दिया गया यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि यह वैश्विक नेतृत्व के बीच बदलते समीकरणों को उजागर करता है। कार्नी के शब्दों में, दुनिया अब पुराने ढांचे पर नहीं चल सकती और अगर वैश्विक स्थिरता बनाए रखनी है, तो सभी देशों को नई सोच और आपसी सहयोग के साथ आगे बढ़ना होगा।
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