वैज्ञानिकों के अनुसार, ये DBPs तब बनते हैं जब पानी को शुद्ध करने के लिए क्लोरीन या अन्य रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। जब ये रसायन पानी में मौजूद जैविक तत्वों के संपर्क में आते हैं, तो नए-नए केमिकल कंपाउंड बन जाते हैं। यही कंपाउंड आगे चलकर सेहत के लिए खतरा बन सकते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई रसायनों का अब तक पूरी तरह से अध्ययन भी नहीं हो पाया है।
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि कुछ DBPs कैंसर, हार्मोनल असंतुलन, लिवर और किडनी से जुड़ी समस्याओं के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। लंबे समय तक ऐसे पानी का सेवन करने से इम्यून सिस्टम पर भी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या तुरंत सामने नहीं आती, लेकिन सालों तक लगातार संपर्क में रहने से इसके दुष्प्रभाव धीरे-धीरे शरीर में दिखने लगते हैं।
बोतलबंद पानी को लेकर एक और चिंता प्लास्टिक पैकेजिंग से जुड़ी है। प्लास्टिक की बोतलों से माइक्रोप्लास्टिक और अन्य रसायन पानी में घुल सकते हैं, खासकर तब जब बोतलें लंबे समय तक धूप या गर्मी में रखी जाएं। इससे पानी की गुणवत्ता और भी ज्यादा प्रभावित हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बोतलबंद पानी को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना सही नहीं है। जरूरत इस बात की है कि उपभोक्ता जागरूक हों और पानी के स्रोत, शुद्धिकरण प्रक्रिया और पैकेजिंग पर ध्यान दें। घरों में इस्तेमाल होने वाले वाटर फिल्टर, नियमित जांच और उबला हुआ पानी कई मामलों में बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर बोतलबंद पानी तुरंत खतरनाक है, लेकिन यह जरूर साफ हो गया है कि “बोतलबंद” होने मात्र से पानी सौ फीसदी सुरक्षित नहीं हो जाता। विशेषज्ञ सरकार और संबंधित एजेंसियों से भी सख्त मानक तय करने और नियमित निगरानी की मांग कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि पानी जैसे बुनियादी जरूरत के मामले में भी आंख मूंदकर भरोसा करना सही नहीं है। सेहत की सुरक्षा के लिए सतर्कता, जानकारी और सही विकल्प चुनना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
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