लंग्स कैंसर: नॉन-स्मोकर्स भी रहें सतर्क, बिना सिगरेट के भी दिख सकते हैं ये अहम लक्षण


 आमतौर पर लंग्स कैंसर को धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। हाल के वर्षों में ऐसे मामलों में इजाफा हुआ है, जहां कभी सिगरेट न पीने वाले लोग भी लंग्स कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, वायु प्रदूषण, पैसिव स्मोकिंग, जहरीली गैसों के संपर्क, रेडॉन गैस और फैमिली हिस्ट्री जैसे कारक नॉन-स्मोकर्स में भी इस बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं। इसलिए यह मान लेना कि “मैं स्मोक नहीं करता, मुझे खतरा नहीं है” एक बड़ी भूल हो सकती है।

नॉन-स्मोकर्स में लंग्स कैंसर के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे उभरते हैं और शुरुआत में सामान्य बीमारियों जैसे लग सकते हैं। यही वजह है कि कई बार बीमारी का पता देर से चलता है। लगातार खांसी रहना, जो दवाइयों के बावजूद ठीक न हो, एक शुरुआती संकेत हो सकता है। कुछ लोगों को सूखी खांसी के साथ सांस लेने में तकलीफ भी महसूस होती है, खासकर सीढ़ियां चढ़ते समय या हल्का सा काम करने पर।

सीने में लगातार दर्द या भारीपन भी लंग्स कैंसर का लक्षण हो सकता है। यह दर्द गहरी सांस लेने, खांसने या हंसने पर बढ़ सकता है। इसके अलावा बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना, भूख न लगना और लगातार थकान महसूस होना भी चेतावनी संकेत माने जाते हैं।

नॉन-स्मोकर्स में एक और अहम लक्षण बार-बार फेफड़ों का इंफेक्शन होना है। अगर आपको बार-बार निमोनिया या ब्रोंकाइटिस हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में खांसी के साथ खून आना या आवाज में बदलाव (भारी या बैठी हुई आवाज) भी देखा जाता है, जो गंभीर संकेत हो सकता है।

जो लोग ज्यादा प्रदूषित इलाकों में रहते हैं या लंबे समय तक इंडस्ट्रियल केमिकल्स, धुएं या धूल के संपर्क में रहते हैं, उनमें जोखिम और बढ़ जाता है। वहीं जिनके परिवार में पहले किसी को कैंसर रहा हो, उनमें जेनेटिक कारणों से भी खतरा हो सकता है।

लंग्स कैंसर से बचाव के लिए समय पर जांच बेहद जरूरी है। अगर ऊपर बताए गए लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए। एक्स-रे, सीटी स्कैन और अन्य जांचों से बीमारी की शुरुआती अवस्था में पहचान संभव है, जिससे इलाज ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

कुल मिलाकर, लंग्स कैंसर सिर्फ स्मोकर्स की बीमारी नहीं है। नॉन-स्मोकर्स को भी अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए। जागरूकता, समय पर जांच और प्रदूषण से बचाव ही इस गंभीर बीमारी से लड़ने का सबसे मजबूत हथियार है।

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