अमेरिकी शांति बोर्ड में शामिल होकर अपने ही घर में घिरे शहबाज शरीफ, विपक्ष का तंज—‘क्या अब नेतन्याहू संग बैठेंगे?’


 अमेरिका के नेतृत्व में गठित अंतरराष्ट्रीय ‘शांति बोर्ड’ में पाकिस्तान की भागीदारी को लेकर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने ही देश में तीखी आलोचनाओं के घेरे में आ गए हैं। इस फैसले के बाद पाकिस्तान की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों ने न केवल सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं, बल्कि इसे संसद की अनदेखी और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ कदम बताया है।

आलोचकों का कहना है कि शांति बोर्ड में शामिल होने का निर्णय बिना संसद से चर्चा या मंजूरी के लिया गया, जो लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत है। विपक्षी नेताओं ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या अब पाकिस्तान की सरकार उन देशों के साथ मंच साझा करेगी, जिनकी नीतियां गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर पाकिस्तान के पारंपरिक रुख से मेल नहीं खातीं। कुछ नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि “अगला कदम क्या होगा—इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ बैठना?”

विवाद की जड़ में यह आरोप है कि इस शांति बोर्ड में शामिल अधिकांश देश गाजा में हमास को निरस्त्र करने की नीति का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान लंबे समय से फिलिस्तीन के समर्थन और इजरायल के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाता रहा है। ऐसे में अमेरिका-प्रेरित पहल का हिस्सा बनना, विपक्ष के अनुसार, पाकिस्तान की विदेश नीति में खतरनाक बदलाव का संकेत देता है।

सरकार का पक्ष है कि यह बोर्ड क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है और पाकिस्तान की भागीदारी का उद्देश्य शांति प्रक्रिया में अपनी आवाज रखना है, न कि किसी एक पक्ष का समर्थन करना। शहबाज सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान ने बोर्ड में शामिल होकर अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया है और वह फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपना रुख पहले की तरह कायम रखेगा।

हालांकि विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं है। उनका तर्क है कि मौजूदा हालात में यह फैसला घरेलू राजनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी पाकिस्तान की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। संसद में इस मुद्दे पर गरमागरम बहस की संभावना जताई जा रही है और कई दलों ने सरकार से औपचारिक स्पष्टीकरण की मांग की है।

कुल मिलाकर, शांति बोर्ड में शामिल होने का फैसला शहबाज शरीफ के लिए कूटनीतिक कदम कम और राजनीतिक सिरदर्द ज्यादा साबित हो रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस आलोचना को कैसे संभालती है और क्या संसद में इस पर कोई व्यापक सहमति बन पाती है या नहीं।

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