कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन कंटेंट बच्चों के जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने कहा, “तकनीक अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन जब वह बच्चों की सोच, संवेदनाओं और रिश्तों की जगह लेने लगे, तब खतरे की घंटी बज जाती है।” लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों में अकेलापन, चिड़चिड़ापन और नकारात्मक विचार बढ़ रहे हैं, जो आगे चलकर मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्याओं का कारण बन सकते हैं।
उन्होंने परिवार की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि माता-पिता को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाने की जरूरत है। “बच्चों को सिर्फ सुविधाएं देना काफी नहीं है, उन्हें समय देना, सुनना और समझना भी उतना ही जरूरी है,” सत्यार्थी ने कहा। उनके अनुसार, जब परिवार में संवाद की कमी होती है, तो बच्चे अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर पाते और धीरे-धीरे भीतर ही भीतर टूटने लगते हैं।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने अहम बात कही। कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि स्कूलों को सिर्फ परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। “शिक्षा का मकसद सिर्फ करियर बनाना नहीं, बल्कि अच्छे इंसान बनाना भी है,” उन्होंने कहा। स्कूलों में जीवन कौशल, नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात होनी चाहिए, ताकि बच्चे दबाव से निपटने के तरीके सीख सकें।
उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं का बोझ उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बना रहा है। हर बच्चे की क्षमता अलग होती है, लेकिन समाज अक्सर तुलना और दबाव के जरिए उन्हें एक ही पैमाने पर तौलता है। इससे आत्मविश्वास में कमी और नकारात्मक सोच जन्म लेती है।
इंटरव्यू के अंत में कैलाश सत्यार्थी ने एक सकारात्मक संदेश देते हुए कहा कि हालात अभी भी सुधारे जा सकते हैं। “अगर परिवार, स्कूल और समाज मिलकर बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, तो हम एक मजबूत और संवेदनशील पीढ़ी तैयार कर सकते हैं,” उन्होंने कहा।
कुल मिलाकर, नोबेल विजेता की यह चेतावनी सिर्फ माता-पिता या शिक्षकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है—कि बच्चों का भविष्य सिर्फ तकनीक के भरोसे नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संवाद और समझ से ही सुरक्षित रह सकता है।
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