डॉ. अभिषेक शंकर ने बताया कि सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण बहुत मामूली या लगभग नजर नहीं आते। इसी वजह से अधिकांश महिलाएं तब डॉक्टर के पास पहुंचती हैं, जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। देर से पहचान होने के कारण इलाज जटिल हो जाता है और जान का खतरा बढ़ जाता है।
आईसीएमआर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल लाखों नए सर्वाइकल कैंसर के मामले सामने आते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में मौतें सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि समय पर जांच और उपचार नहीं हो पाता। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर शुरुआती स्टेज में इस कैंसर की पहचान हो जाए, तो इसका इलाज पूरी तरह संभव है और मरीज की जान बचाई जा सकती है।
सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) संक्रमण माना जाता है। यह वायरस लंबे समय तक शरीर में रहने पर कैंसर का रूप ले सकता है। सुरक्षित जीवनशैली, नियमित जांच और एचपीवी वैक्सीनेशन के जरिए इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके बावजूद भारत में जागरूकता की कमी के चलते महिलाएं जांच से कतराती हैं।
डॉ. शंकर के अनुसार, 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को नियमित रूप से सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग करानी चाहिए। पाप स्मीयर टेस्ट और एचपीवी टेस्ट जैसी जांचें शुरुआती बदलावों को पकड़ने में मदद करती हैं। साथ ही, किसी भी तरह के असामान्य लक्षण जैसे अनियमित रक्तस्राव, लंबे समय तक दर्द या असहजता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार, स्वास्थ्य संस्थान और समाज मिलकर जागरूकता अभियान चलाएं, तो सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है। समय पर जांच, सही इलाज और जागरूकता ही इस बीमारी से लड़ने का सबसे मजबूत हथियार है।
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