ट्रंप को डुबो देगा उनका घमंड? एक साल में 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से तोड़ा नाता, क्या है अमेरिका का असली प्लान


 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने आक्रामक और राष्ट्रवादी फैसलों को लेकर वैश्विक बहस के केंद्र में हैं। ताजा मामला विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से अमेरिका के बाहर निकलने का है। अमेरिका ने न सिर्फ WHO की सदस्यता खत्म कर दी है, बल्कि अब संगठन को किसी तरह की फंडिंग या तकनीकी मदद भी नहीं देगा। यह कदम वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिहाज से एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

WHO से अलग होने का फैसला ऐसे समय पर आया है, जब दुनिया महामारी, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य असमानताओं जैसी साझा चुनौतियों से जूझ रही है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि WHO “अमेरिका के हितों के अनुरूप काम नहीं करता” और उस पर चीन का प्रभाव ज्यादा है। ट्रंप पहले भी कई बार WHO को “अक्षम” और “पक्षपाती” बता चुके हैं।

लेकिन WHO अकेला संगठन नहीं है जिससे अमेरिका ने किनारा किया हो। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ एक साल के भीतर अमेरिका करीब 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, समझौतों और मंचों से खुद को अलग कर चुका है। इनमें जलवायु, मानवाधिकार, व्यापार और स्वास्थ्य से जुड़े कई अहम वैश्विक प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति अमेरिका को दुनिया में और ज्यादा अलग-थलग कर रही है।

आलोचकों का कहना है कि यह नीति ट्रंप के घमंड और एकतरफा सोच का नतीजा है। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दूरी बनाकर अमेरिका अपनी ही सॉफ्ट पावर को कमजोर कर रहा है। WHO जैसे संगठनों में अमेरिका की भूमिका सिर्फ फंडिंग तक सीमित नहीं थी, बल्कि नीति-निर्माण और वैश्विक दिशा तय करने में भी उसकी बड़ी हिस्सेदारी रही है। अब इस खाली जगह को दूसरे देश भर सकते हैं।

दूसरी ओर, ट्रंप समर्थक इसे एक साहसिक और जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका वर्षों से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को जरूरत से ज्यादा फंड देता रहा है, जबकि बदले में उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिला। ट्रंप का प्लान साफ है—वैश्विक जिम्मेदारियों से पीछे हटकर घरेलू हितों पर फोकस

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इस रणनीति का असर लंबे समय में अमेरिका के खिलाफ जा सकता है। वैश्विक स्वास्थ्य संकटों से लेकर कूटनीतिक प्रभाव तक, अमेरिका की गैरमौजूदगी उसे निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर सकती है।

अब बड़ा सवाल यही है—क्या ट्रंप का यह अलगाववादी रास्ता अमेरिका को मजबूत बनाएगा या उनका यही घमंड भविष्य में अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को डुबो देगा? दुनिया की नजरें इसी जवाब पर टिकी हैं।

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