अमेरिका एक बार फिर रूस से जुड़े ऊर्जा कारोबार को लेकर सख्त रुख अपनाने की तैयारी में है। रूसी तेल की खरीद पर रोक लगाने के उद्देश्य से अमेरिका भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार देशों पर कड़े प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। इस बीच पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक प्रमुख सहयोगी ने संकेत दिए हैं कि एक नया प्रतिबंध विधेयक मंजूरी के करीब है, जिसके तहत टैरिफ को 500 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इस बयान के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि यह विधेयक उन देशों को निशाना बनाता है जो रूस से कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा संसाधन खरीद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि रूसी तेल से होने वाली आय यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक मदद कर रही है। इसी कारण वाशिंगटन लंबे समय से रूस पर दबाव बनाने के लिए उसके ऊर्जा निर्यात को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। अब यह दबाव सीधे उन देशों पर डाला जा सकता है, जो रूस से तेल आयात जारी रखे हुए हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी के अनुसार, इस विधेयक को सीनेट में पेश करने की तैयारी है और इसे दोनों दलों का समर्थन मिल सकता है। यदि यह कानून बनता है, तो रूसी तेल खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर अमेरिका भारी टैरिफ लगा सकता है, जो 500 प्रतिशत तक हो सकता है। यह कदम न केवल व्यापारिक दृष्टि से बड़ा होगा, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
भारत और चीन वर्तमान में रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब रूस ने रियायती दरों पर तेल बेचना शुरू किया, जिसका लाभ इन देशों ने उठाया। अमेरिका का प्रस्तावित कदम भारत-अमेरिका और चीन-अमेरिका संबंधों में नई चुनौती खड़ी कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 500 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है, तो इससे वैश्विक व्यापार संतुलन, ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ेगा। साथ ही, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपने इस कदम से सहयोगी देशों को नाराज़ करने का जोखिम उठाएगा।
फिलहाल सभी की निगाहें अमेरिकी सीनेट पर टिकी हैं, जहां इस विधेयक पर चर्चा होनी है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि अमेरिका वास्तव में कितनी सख्ती से रूसी तेल व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए आगे बढ़ता है और इसका वैश्विक स्तर पर क्या असर पड़ता है।
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