सूत्रों के मुताबिक, बजट में एमएसएमई निर्यातकों के लिए कई राहतों का ऐलान किया जा सकता है। इनमें सस्ती पूंजी की उपलब्धता, क्रेडिट गारंटी स्कीम का विस्तार और ब्याज दरों में सब्सिडी शामिल हो सकती है। सरकार का मानना है कि एमएसएमई देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और रोजगार सृजन में उनकी भूमिका अहम है। ऐसे में वैश्विक बाजारों तक उनकी पहुंच आसान बनाना आर्थिक विकास के लिए जरूरी है।
यूरोपीय बाजार पर खास फोकस की एक बड़ी वजह भारत-यूरोप के बीच बढ़ता व्यापारिक सहयोग और प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) हैं। यूरोप में भारतीय टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो कंपोनेंट्स, इंजीनियरिंग गुड्स और हस्तशिल्प उत्पादों की अच्छी मांग है। बजट में गुणवत्ता मानकों, सर्टिफिकेशन और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट को लेकर विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं, ताकि एमएसएमई यूरोपीय नियमों और मानकों पर खरे उतर सकें।
इसके अलावा जीएसटी को लेकर भी एमएसएमई को राहत मिलने की उम्मीद है। सरल रिटर्न फाइलिंग, तेज रिफंड प्रक्रिया और छोटे कारोबारियों के लिए अनुपालन बोझ कम करने जैसे कदम बजट का हिस्सा बन सकते हैं। निर्यातकों के लिए जीएसटी रिफंड में देरी लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है, जिसे दूर करने पर सरकार का ध्यान रहेगा।
वैश्विक टैरिफ जंग के माहौल में सरकार निर्यातकों को जोखिम से बचाने के लिए बीमा और हेजिंग सुविधाओं को भी मजबूत कर सकती है। एक्सपोर्ट क्रेडिट एजेंसियों की भूमिका बढ़ाने और नए बाजारों में प्रवेश के लिए मार्केटिंग सपोर्ट देने पर भी विचार किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह बजट एमएसएमई सेक्टर के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। अगर प्रस्तावित कदम जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होते हैं, तो भारतीय एमएसएमई न केवल घरेलू बाजार में मजबूत होंगे, बल्कि यूरोप समेत वैश्विक मंच पर भारत की आर्थिक ताकत को भी नई पहचान दिला सकते हैं।
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