स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, केंद्रीय ड्रग एजेंसी (CDSCO) ने जांच के दौरान 74 दवाओं के नमूनों को फेल पाया है। वहीं, अलग-अलग राज्य ड्रग कंट्रोल अथॉरिटीज द्वारा जांचे गए 93 सैंपल भी गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इन सभी नमूनों को देश के विभिन्न हिस्सों से रूटीन सर्विलांस और शिकायतों के आधार पर जांच के लिए लिया गया था।
रिपोर्ट में बताया गया है कि फेल पाई गई दवाओं में कुछ ऐसी थीं, जिनमें एक्टिव इंग्रीडिएंट की मात्रा तय मानक से कम या ज्यादा थी। इसका सीधा असर दवा की प्रभावशीलता पर पड़ता है और मरीज को पूरा इलाज नहीं मिल पाता। कुछ मामलों में दवाओं की डिसॉल्विंग कैपेसिटी और स्टेबिलिटी भी मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इन फेल सैंपल्स में नकली (स्प्यूरियस) दवाएं भी शामिल हैं। नकली दवाएं न सिर्फ इलाज को बेअसर बना देती हैं, बल्कि मरीज की जान के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने साफ किया है कि नकली दवाओं के मामलों में संबंधित निर्माताओं और सप्लाई चेन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मंत्रालय के अनुसार, जिन दवाओं के नमूने फेल हुए हैं, उनकी जानकारी राज्यों और संबंधित एजेंसियों को भेज दी गई है। इन दवाओं को बाजार से हटाने, स्टॉक सीज करने और जिम्मेदार कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, दवा कंपनियों को गुणवत्ता नियंत्रण और मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस को और मजबूत करने की सलाह भी दी गई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी रिपोर्ट्स यह दिखाती हैं कि दवा निगरानी व्यवस्था को और सख्त बनाने की जरूरत है। मरीजों को भी सलाह दी जाती है कि वे दवाएं हमेशा भरोसेमंद मेडिकल स्टोर से ही खरीदें, पैकेजिंग, बैच नंबर और एक्सपायरी डेट जरूर जांचें और किसी भी तरह की शंका होने पर डॉक्टर या फार्मासिस्ट से संपर्क करें।
कुल मिलाकर, स्वास्थ्य मंत्रालय की यह कार्रवाई मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से अहम कदम है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी है कि दवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में सख्त निगरानी और कार्रवाई ही इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकती है।
0 टिप्पणियाँ