एजुकेशन फॉर भारत कॉन्क्लेव का शुभारंभ शनिवार सुबह 11 बजे धूमधाम से हुआ। भारत में शिक्षा के बदलते परिदृश्य, भविष्य की जरूरतों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के उद्देश्यों पर केंद्रित इस महाकुंभ में देश के अनेक विशेषज्ञ, शिक्षाविद, नीति-निर्माता और प्रेरक हस्तियां शामिल हुईं। इसी कड़ी में तीसरे सत्र की शोभा बढ़ाई भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग ने, जिन्होंने शिक्षा से जुड़े अपने विचार बड़े ही सरल लेकिन प्रभावशाली तरीके से साझा किए।
सहवाग ने अपने संबोधन की शुरुआत प्रेरक अंदाज में की। उन्होंने कहा कि शिक्षा सिर्फ किताबों में सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की समझ, निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास विकसित करने का साधन है। उन्होंने अपने बचपन के अनुभवों को याद करते हुए बताया कि कैसे पढ़ाई के साथ खेल ने भी उन्हें अनुशासन, धैर्य और जिम्मेदारी सिखाई। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आज वे जिस मुकाम पर हैं, उसके पीछे उनके पिता का बड़ा सपना और निरंतर समर्थन था। उन्होंने गर्व से कहा, “मैं आज जो कुछ भी बना हूँ, वह अपने पिता के सपने को पूरा करने की वजह से ही है।”
सहवाग ने आज की शिक्षा प्रणाली पर सवाल भी उठाए और सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि सिर्फ रटने की आदतों से बच्चों में वह आत्मविश्वास और कौशल विकसित नहीं हो पाता, जिसकी उन्हें भविष्य में सबसे ज्यादा जरूरत होगी। इसलिए स्कूलों और अभिभावकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ नई स्किल्स भी सीखें—चाहे वह कला हो, खेल, तकनीक, संचार क्षमता या समस्या समाधान कौशल। उन्होंने जोर देकर कहा कि आने वाले समय में वही बच्चे सफल होंगे, जिनमें सीखने की जिज्ञासा और नए कौशल अपनाने की क्षमता होगी।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सहवाग ने शिक्षक–छात्र संबंधों की अहमियत पर भी रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि एक अच्छा शिक्षक बच्चे की दिशा बदल सकता है। इसलिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों का निर्माण देश के भविष्य निर्माण की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने सरकार, संस्थानों और अभिभावकों से अनुरोध किया कि वे शिक्षा को केवल करियर की दृष्टि से न देखें, बल्कि इसे राष्ट्र निर्माण का आधार समझें।
अंत में सहवाग ने यह प्रेरक संदेश दिया कि भारत तभी शिक्षा में अग्रणी बनेगा, जब हर बच्चा अपनी क्षमता पहचानकर आगे बढ़े और समाज उसे अवसर प्रदान करे।

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