अल्यो गुदवा ली निठल्ली निष्ठा

महेश शर्मा : एक खबर आयी देखो एक खबर आयी, बांह में दुई नेता की फोटोएँ गुदवायी। नेता, पुत्र और बांह की कहानी” इसे आप खेल भावना से लेकर एन्जॉय कीजियेगा। प्लीज कोई पर्सनली न लेन। राजनीति में समर्पण के कई रूप होते हैं। किसी के लिए नारे लगाना, किसी के लिए धरना देना, किसी के लिए सोशल मीडिया पर लड़ जाना। लेकिन हमाये मुहल्ले के एक निहायत ही जागरूक कार्यकर्ता ने समर्पण की ऊँचाइयों को ऊंचाई से भी इतना ऊंचा पहुंचा दिया है कि जहाँ अब लोकतंत्र भी हाथ जोड़कर कह रहा है, “भइया अब बस!” वरना समर्पण भी भम्म से फट पड़ेगा। दरअसल समर्पण के सारे कीर्तिमान ध्वस्त करते हुए यह महान कार्यकर्ता अपनी बाँह पर नेता जी और नेता बनने की राह पर अग्रसर उनके पुत्र का टैटू गुदवाकर पूरे मोहल्ले में घूम रहा है। लोग होंठ दबाकर खिल्ल से हंस देते हैं। पर वह तो ऐसी शान से हाथ ऊपर करता है जैसे तथाकथित चुनाव आयोग ने उसे “जीवनपर्यंत समर्थक” का प्रमाण पत्र जारी कर दिया हो। मुहल्ले के ही अनन्त प्रसाद चतुर्दशी पूंछते हैं “भाई, यह क्या है?” वह गर्व से कहता है, “भइया, यह कर्मयोग है, खाल में लिखी निष्ठा!” टैटू आर्टिस्ट भी भावुक हो गया था। 


ऐसी श्रद्धा उसने सिर्फ उन ग्राहकों में देखी थी जो अपने प्रथम प्रेम का नाम गुदवाते हैं। लेकिन पहली बार उसने देखा कि प्रेम राजनीति से भी हो सकता है, और इतना गहरा कि दर्द भी लोकतंत्र की तरह सहन कर लिया जाए। कहा जा रहा है कि वह कार्यकर्ता अब अपनी बांह को ‘स्थायी सदस्यता कार्ड’ की तरह इस्तेमाल करता है। कहीं पार्टी ऑफिस जाना हो, बस बांह दिखा देता है। दरवाज़ा अपने आप खुल जाता है। फिर चाहे दरवाजा पार्टी दफ्तर का हो या सदन का। कुछ लोग यह भी दावा करते हैं कि नेता जी ने स्वयं एक बार उसकी बांह को देखकर हल्की सी मुस्कान भरी थी; और तब से कार्यकर्ता का आत्मविश्वास के सेंसेक्स ने ऐसी उछाल मेरी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और निफ्टी भी दांतों तले उंगलियां दबाकर शरमा रहे हैं। यह उछाल नहीं छलांग है आम के दरख़्त से सरसों के खेत तक, तो कभी रिवर्स छलांग भी यानी सरसों के खेत से आम के दरख़्त तक। सब कतहूँ चर्चा यह भी है कि अगली बार वह अपने सीने पर संकल्प-योजना, पीठ पर घोषणापत्र और पैर पर पार्टी का रोडमैप गुदवाने पर विचार कर रहा है, ताकि उसका पूरा शरीर एक चलता-फिरता ‘मैनिफेस्टो म्यूज़ियम’ बन जाए। फुल टाइम पॉलिटिशियन्स कहते हैं कि यह सब आधुनिक राजनीति में ‘शारीरिक ब्रांडिंग’ की प्रवृत्ति का हिस्सा है, जहाँ चेले अपने नेता के प्रति श्रद्धा को उस स्तर तक ले जाते हैं, जहाँ डॉक्टर भी कहते हैं, “टैटू हटवाना है तो पहले पार्टी अनुमति लेकर आएं।” और नेता जी? वे शांत हैं। उन्हें पता है कि लोकतंत्र में सबसे कीमती चीज़ जनता नहीं बल्कि उसकी भावनाएं होती हैं। और जब भावनाएं स्याही बनकर किसी की बांह में बस जाएँ, तो फिर चुनावी मौसम में रंग चढ़ने की कोई चिंता नहीं रहती। समर्पण की इस नई मिसाल ने एक बात तो साबित कर दी है कि राजनीति बदल रही हो या न बदल रही हो, पर समर्थकों की ‘बांहें’ अब निश्चित रूप से पहले से कहीं ज़्यादा जागरूक हो चुकी हैं। तभी तो कहा है कि 'यूं न शरमा फैला दे अपनी गोरी-गोरी बाँहें, टैटू वालों से हम ये कह दें के तुझी को हम चाहें...।'
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं |

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