खालिदा जिया: भारत में जन्मी ‘पुतुल’ से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनने तक का सफर


 खालिदा जिया का नाम बांग्लादेश की राजनीति में एक मजबूत और प्रभावशाली नेता के रूप में लिया जाता है। उनका जीवन निजी संघर्षों, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और सत्ता की जिम्मेदारियों से भरा रहा है। भारत में जन्म लेकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनने तक का उनका सफर असाधारण माना जाता है।

भारत में जन्म और शुरुआती जीवन

खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के दीनाजपुर (अब भारत के पश्चिम बंगाल में) में हुआ था। बचपन में उन्हें परिवार में प्यार से ‘पुतुल’ कहा जाता था। बाद में उनका परिवार तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) चला गया। उनकी शुरुआती शिक्षा वहीं हुई और उनका जीवन सामान्य गृहिणी की तरह आगे बढ़ रहा था।

जिया-उर-रहमान से विवाह और जीवन में मोड़

खालिदा जिया का विवाह बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति और सेना प्रमुख जिया-उर-रहमान से हुआ। यही रिश्ता उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। 1981 में जिया-उर-रहमान की हत्या के बाद खालिदा जिया का जीवन पूरी तरह बदल गया। पति की मृत्यु के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुईं और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की कमान संभाली।

राजनीति में प्रवेश और पहचान

खालिदा जिया ने सैन्य शासन के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी और जल्द ही एक सशक्त विपक्षी नेता के रूप में उभरीं। उन्होंने तानाशाही शासन के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया, जिससे उन्हें जनता का व्यापक समर्थन मिला। उनकी नेतृत्व क्षमता और दृढ़ता ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया।

प्रधानमंत्री के रूप में भूमिका

खालिदा जिया पहली बार 1991 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद 1996 और फिर 2001 में उन्होंने सत्ता संभाली। उनके कार्यकाल में संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने, अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया गया। हालांकि, उनके शासन पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक टकराव के आरोप भी लगे।

बेटे और पारिवारिक जीवन

खालिदा जिया के दो बेटे हैं। बड़े बेटे तारिक रहमान को BNP की राजनीति में उत्तराधिकारी माना जाता है, जबकि छोटे बेटे अराफात रहमान का निधन हो चुका है। पारिवारिक जीवन और राजनीति—दोनों मोर्चों पर उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

हालिया वर्ष और राजनीतिक सफर

बीते वर्षों में खालिदा जिया का राजनीतिक सफर स्वास्थ्य समस्याओं और कानूनी मामलों के कारण सीमित रहा। इसके बावजूद, वे आज भी बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली प्रतीक मानी जाती हैं। भारत में जन्मी ‘पुतुल’ से लेकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनने तक का उनका सफर दक्षिण एशियाई राजनीति के इतिहास में खास स्थान रखता है।

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