रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे का दूसरा दिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। इस यात्रा से न सिर्फ दोनों देशों के आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को नई गति मिलने की उम्मीद है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण चर्चाओं के होने के संकेत मिल रहे हैं। भारत और रूस दशकों से रक्षा साझेदारी में जुड़े हुए हैं, और यह संबंध उस समय से कायम है जब सोवियत संघ का विघटन भी नहीं हुआ था।
लंबे समय तक भारत की रक्षा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा रूस से ही पूरा होता आया है। चाहे लड़ाकू विमान हों, पनडुब्बियां हों, हेलिकॉप्टर हों या एयर डिफेंस सिस्टम—रूस भारतीय सेनाओं के लिए प्रमुख सप्लायर रहा है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी रक्षा खरीद के स्रोतों में विविधता लाई है और फ्रांस, इस्राइल तथा अमेरिका जैसे देशों से भी बड़े सौदे किए हैं, फिर भी रूस आज भी भारत के रक्षा क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी देशों में शामिल है।
रूस के साथ हो रही चर्चाओं में इस बार विशेष रूप से एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम पर भारतीय रुचि की चर्चा है। भारत पहले से रूस के एस-400 सिस्टम का उपयोग कर रहा है और एस-500 दुनिया के सबसे उन्नत मिसाइल डिफेंस सिस्टम में से एक माना जाता है। यदि इस पर कोई प्रारंभिक सहमति बनती है, तो यह भारत की वायु रक्षा क्षमता को नए स्तर पर पहुंचा सकता है।
इसके साथ ही, पाचवीं पीढ़ी के रूसी लड़ाकू विमान Su-57 भी चर्चा में हैं। कुछ रिपोर्ट्स संकेत देती हैं कि भारत इस विमान की क्षमताओं और संभावित साझेदारी मॉडल को लेकर रूस के साथ वार्ता आगे बढ़ाना चाहता है। भारत भविष्य की वायु शक्ति के लिए अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों पर ध्यान दे रहा है, ऐसे में Su-57 जैसे प्लेटफॉर्म पर सहयोग रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
कुल मिलाकर, पुतिन का यह दौरा सिर्फ पारंपरिक सहयोग को मजबूत करने तक सीमित नहीं है। यह ऐसी यात्रा है जिसमें रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन, मेंटेनेंस सपोर्ट, और भविष्य की तकनीकी साझेदारी जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाओं के खुलने की उम्मीद है। भारत आज आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को प्राथमिकता दे रहा है, और रूस इस दिशा में उसका एक प्रमुख सहयोगी साबित हो सकता है।
दौरे के दौरान होने वाली चर्चाएँ यह स्पष्ट करेंगी कि भारत आने वाले वर्षों में कौन-कौन से उन्नत रूसी रक्षा सिस्टम अपनी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनाना चाहता है, और दोनों देश मिलकर रक्षा साझेदारी को किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं।
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