सरकारी अस्पतालों में दिन-रात मरीजों की सेवा करने वाले डॉक्टर आज खुद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक नए शोध में सामने आया है कि काम का अत्यधिक दबाव, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव डॉक्टरों की सेहत पर भारी पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 48 प्रतिशत डॉक्टर हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से पीड़ित पाए गए, जबकि हर चौथा डॉक्टर (लगभग 23%) डायबिटीज का शिकार है। ये आंकड़े न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि देश की हेल्थकेयर व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चेतावनी हैं।
लंबी ड्यूटी और तनाव बन रहे बीमारी की वजह
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों को रोजाना कई-कई घंटे लगातार काम करना पड़ता है। मरीजों की अधिक संख्या, स्टाफ की कमी और इमरजेंसी ड्यूटी के चलते उन्हें आराम का समय बहुत कम मिल पाता है। नींद की कमी और लगातार बना रहने वाला मानसिक तनाव हाई बीपी और शुगर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है।
अनहेल्दी लाइफस्टाइल भी एक बड़ा कारण
काम के दबाव के चलते कई डॉक्टर समय पर खाना नहीं खा पाते या जंक फूड पर निर्भर हो जाते हैं। नियमित एक्सरसाइज और वॉक के लिए समय निकाल पाना भी मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि कम उम्र में ही डॉक्टर लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
मेंटल हेल्थ पर भी पड़ रहा असर
शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ डॉक्टरों की मानसिक सेहत भी प्रभावित हो रही है। लगातार जिम्मेदारी, मरीजों और उनके परिजनों का दबाव, और कभी-कभी नकारात्मक माहौल डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है। इसका असर उनकी कार्यक्षमता और निजी जीवन दोनों पर पड़ता है।
सिस्टम में बदलाव की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टरों की सेहत सुधारने के लिए हेल्थकेयर सिस्टम में बदलाव जरूरी है। काम के घंटे तय करना, पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति, नियमित हेल्थ चेकअप और स्ट्रेस मैनेजमेंट प्रोग्राम जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।
निष्कर्ष
जो डॉक्टर समाज की सेहत की जिम्मेदारी उठाते हैं, उनकी खुद की सेहत का ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी है। यह शोध साफ संकेत देता है कि अगर समय रहते हालात नहीं बदले, तो इसका असर पूरे हेल्थ सिस्टम पर पड़ सकता है। डॉक्टरों को स्वस्थ रखना, दरअसल पूरे समाज को स्वस्थ रखने की दिशा में एक अहम कदम है।
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