श के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आज पूरे राष्ट्र में गर्व और उत्साह का माहौल है। इस ऐतिहासिक पलों को चिह्नित करने के लिए संसद में विशेष चर्चा आयोजित की जा रही है, जिसमें इस गीत के जन्म, उसके महत्व और उसके राष्ट्रव्यापी प्रभाव पर विचार रखा जाएगा। 1875 में लिखी गई यह रचना केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बन गई।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित ‘वंदे मातरम’ मूलतः उनकी प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा था। इस गीत को उन्होंने राष्ट्रमाता के स्वरूप को समर्पित किया था, जिसमें मातृभूमि को देवी के रूप में चित्रित किया गया। इस गीत ने भारतीयों के भीतर उपनिवेशवाद के खिलाफ अटूट जोश और राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया।
बाद में इस गीत को आवाज दी रवींद्रनाथ टैगोर ने, जिन्होंने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार सुरों में प्रस्तुत किया। टैगोर द्वारा संगीतबद्ध किए जाने के बाद इसका प्रभाव और गहराई कई गुना बढ़ गई। यह गीत पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे प्रमुख नारा बन गया। “वंदे मातरम” केवल एक गीत नहीं रहा, यह अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष का जयघोष बन गया। आज़ादी के दीवानों की रैलियों, सभाओं और आंदोलनों में यही स्वर गूंजता था।
भारत की स्वतंत्रता के बाद 1950 में इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ यह गीत भारतीय पहचान का महत्वपूर्ण अंग बन गया। इसके बोल मातृभूमि के प्रति समर्पण, वीरता, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य की अनूठी घनघोर प्रशंसा करते हैं।
इस वर्ष वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन, वाद-विवाद, प्रदर्शनी और विशेष सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। संसद में होने वाली चर्चा में इसके ऐतिहासिक महत्व, साहित्यिक मूल्य और राष्ट्रीय एकता में इसकी भूमिका पर विस्तार से विचार किया जाएगा। इस दौरान बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के योगदान, उनके साहित्यिक अवदान और टैगोर द्वारा दिए गए संगीत की धुनों को भी याद किया जाएगा।
वंदे मातरम आज भी करोड़ों भारतीयों के दिल में देशभक्ति की वही तीव्र भावना जगाता है, जिसने स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया था। इसके 150 वर्ष पूरे होने का यह अवसर हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय मूल्यों को दोबारा महसूस करने का मौका देता है।
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