एलजीबीटीक्यू+ कानपुर प्राइड मार्च आज समानता की राह पर समाज और कानून

 कानपुर। तृतीय कानपुर क्वीर प्राइड मार्च 9 नवम्बर (रविवार) को नवीन मार्केट से नानाराव पार्क तक पूर्वान्ह 11 बजे आयोजित किया गया है। हर वर्ष भारत सहित दुनिया के कई देशों में रंग-बिरंगे झंडों, नारे और गीतों के बीच एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+: Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Queer, आदि) समुदाय अपने अस्तित्व, सम्मान और समान अधिकारों की मांग लेकर सड़कों पर उतरता है। इसे “प्राइड मार्च” कहा जाता है गर्व और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है। कानपुर में इसकी कमान कानपुर क्वीर सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष अनुज पंडे के हाथों में है।



इस आंदोलन की जड़ें समाज में लंबे समय से चली आ रही भेदभाव, अस्वीकार और अदृश्यता की पीड़ा से जुड़ी हैं।समलैंगिक या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अक्सर परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल और समाज में पूर्वाग्रह और उपहास का सामना करना पड़ता है। कई परिवार अब भी इसे “बीमारी” या “पाप” मानते हैं। परिणामस्वरूप, बहुत से लोग अपनी पहचान छिपाने को मजबूर रहते हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए मुख्यधारा में नौकरी पाना कठिन होता है। कई लोग शिक्षा या रोजगार से वंचित रह जाते हैं, जिससे गरीबी और भिक्षावृत्ति की समस्या बढ़ती है। लगातार तिरस्कार और सामाजिक अस्वीकार्यता के कारण डिप्रेशन, आत्मघात प्रवृत्ति और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ व्यापक हैं। समलैंगिक जोड़ों को अब भी कानूनी विवाह, गोद लेने, उत्तराधिकार और पारिवारिक लाभों में बराबरी नहीं मिली है। यह एक बड़ी विधिक कमी मानी जाती है। कई बार पुलिस और आमजन दोनों द्वारा यौन हिंसा, ब्लैकमेलिंग और धमकी जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। हालांकि कानून में सुधार हुआ है, लेकिन अमल अब भी कमजोर है। विधिक पक्ष पर दृष्टिपात करें तो 6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 (समलैंगिक संबंध अपराध) को असंवैधानिक घोषित किया। यह फैसला “नवतेज सिंह जोहार बनाम भारत सरकार” केस में आया और इसने एलजीबीटीक्यू समुदाय को जीने और प्रेम करने का मौलिक अधिकार दिया। 



ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019

यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव को दंडनीय बनाता है। शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं में समान अवसर की गारंटी देता है।

हालाँकि एक्ट की कुछ धाराएँ (जैसे “पहचान प्रमाण पत्र” की शर्तें) विवादास्पद हैं।समलैंगिक विवाह पर कानूनी स्थिति (2023) यह है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से इनकार किया, यह कहते हुए कि यह विधायिका का विषय है। फिर भी, अदालत ने सरकार को एलजीबीटीक्यू जोड़ों के लिए समान नागरिक अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। संविधानिक सुरक्षा, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव निषेध) और 21 (जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत एलजीबीटीक्यू समुदाय कोसमान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं। सामाजिक जागरूकता और प्राइड मार्च का महत्व केवल उत्सव नहीं है, बल्कि अदृश्य से दृश्य बनने की प्रक्रिया है। यह समुदाय को अपनी पहचान और अस्तित्व पर गर्व करने का अवसर देता है, और समाज को यह संदेश देता है कि “प्यार, प्यार होता है। चाहे जो भी हो।”

विभिन्न शहरों में जैसे दिल्ली क्वीर प्राइड, मुंबई प्राइड, कोलकाता रेनबो प्राइड,

अब सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। एलजीबीटीक्यू+ समुदाय की लड़ाई केवल “अधिकारों” की नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता की है। कानून बदल चुके हैं, पर समाज की सोच को बदलना अभी बाकी है। जब तक हर व्यक्ति को अपने प्रेम, पहचान और जीवन पर गर्व महसूस करने का अधिकार नहीं मिलता,

तब तक “प्राइड” की यात्रा अधूरी है।


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