महेश शर्मा : बिहार में सीपीआई (माले) बिहार में महागठबंधन के घटक के रूप में 20 सीटों पर चुनावी मैदान में है। पार्टी के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य 100 रैलियां सम्बोधित कर चुके हैं। 2020 में पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा और 12 जीतीं। पार्टी की जनसंघर्ष से जनमत तक की यात्रा।
सीपीआई (माले) की नींव 1960 के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी आंदोलन से पड़ी, जिसने सशस्त्र किसान संघर्ष के जरिए भूमि सुधार की मांग उठाई। बिहार में यह आंदोलन विशेष रूप से भोजपुर, जहानाबाद, गया, अरवल और सिवान में मजबूत हुआ। यहाँ माले ने जमींदारी उत्पीड़न और जातीय हिंसा के खिलाफ गरीबों की लामबंदी की। समय के साथ पार्टी ने हथियारबंद संघर्ष से लोकतांत्रिक राजनीति की ओर रुख किया, और अब यह बिहार की विधान सभा में एक सक्रिय विपक्षी आवाज़ है। सीपीआई (माले) का सबसे बड़ा बल उसका संगठन है। पार्टी गाँव-गाँव तक फैले कमेटियों, महिला मोर्चों, छात्र संगठनों और मजदूर यूनियनों के जरिए काम करती है। चुनाव के समय यह महंगे प्रचार या टीवी विज्ञापनों पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि सड़क पर जनसंपर्क, पदयात्रा, नुक्कड़ सभाएँ, जनगीत, दीवार लेखन और नारेबाजी इसके मुख्य माध्यम होते हैं। पार्टी प्रायः 20 के करीब सीटों पर ही उम्मीदवार उतारती है, लेकिन हर प्रत्याशी स्थानीय संघर्षों से निकला व्यक्ति होता है। कोई शिक्षक, कोई किसान नेता या मजदूर संगठन का कार्यकर्ता। सीपीआई (माले) का चुनाव प्रचार पूरी तरह से जन-केंद्रित और वैचारिक होता है।
प्रचार वाहन से लाउडस्पीकर बजता है, “गरीब की सरकार चाहिए, माले-राजद-लेफ्ट गठबंधन लाएगा बदलाव!”
गाँवों में महिलाएँ लाल झंडे लेकर गीत गाती हैं, बच्चे नारे लगाते हैं, और दीवारों पर हाथ से लिखा होता है, “रोटी-रोज़गार की लड़ाई, लाल झंडे की अगुवाई।” प्रचार का केंद्र “नेता नहीं, मुद्दा” होता है। सोशल मीडिया का उपयोग सीमित होते हुए भी युवाओं को जोड़ने का प्रभावी जरिया बन रहा है, खासकर AISA और RYA के कार्यकर्ताओं द्वारा।
माले के प्रमुख मुद्दे
भाकपा (माले) के प्रमुख चुनावी मुद्दे- भूमिहीनों को जमीन का अधिकार, मजदूरी दरों में सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का सरकारीकरण, महिला सशक्तिकरण।
इन मुद्दों पर पार्टी राजनीतिक नारे नहीं, संघर्षों के अनुभव प्रस्तुत करती है। 2020 के चुनाव में सीपीआई (माले) ने राजद और अन्य वाम दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। इस बार उसका प्रचार अभियान अत्यंत सशक्त और भावनात्मक था—“गरीबों की सरकार चाहिए” और “संविधान बचाओ, मेहनतकशों का हक दिलाओ” जैसे नारों के साथ पार्टी ने 12 सीटें जीतीं, जो उसके इतिहास का सबसे उल्लेखनीय प्रदर्शन था।
इससे यह सिद्ध हुआ कि जनता वैचारिक ईमानदारी और संघर्षशील नेतृत्व को अब भी महत्व देती है। जहाँ बड़े दल कारपोरेट फंडिंग, हेलीकॉप्टर और विज्ञापनबाज़ी में करोड़ों खर्च करते हैं, वहीं माले का प्रचार जनसहयोग और कार्यकर्ताओं की मेहनत से चलता है। हर कार्यकर्ता अपने इलाके में प्रचारक होता है, चाहे वह छात्र हो या खेतिहर मजदूर। इस ‘जन-से-जन’ पहुँच ने माले को बिहार में विचारधारा की विश्वसनीय आवाज़ बना दिया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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