श्रद्धांजलि-लोकतंत्र में सरल नेतृत्व की मिसाल थे श्रीप्रकाश जायसवाल

महेश शर्मा                                                                                कानपुर। हम लोग उन्हें भैया कहकर संबोधित करते थे। ढेरों संस्मरण हैं। मेरी नजदीकियां उनसे तब से प्रगाढ़ होती गईं जब वह मेयर चुने गए थे। तमाम गम्भीर राजनीतिक मामलों में मुझसे चर्चा और सलाह लेना मुनासिब समझते थे। वह एक बेहद सुलझे हुए नेता थे। कह सकते हैं कि जायसवाल वाज स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स फ़ॉर यूथ।

भारतीय राजनीति में कुछ नेता पदों की ऊँचाइयों से नहीं, बल्कि अपने सरल व्यवहार और जनता से बने आत्मीय रिश्तों से पहचाने जाते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल कुछ ऐसी ही शख्सियत थे कि सादगी से भरे, संयमित भाषा वाले और डेमोक्रेटिक संवाद के कल्चर को अपनी कार्यशैली में जीवित रखने वाले व्यक्ति थे। कानपुर की गलियों से दिल्ली की सत्ता तक उनका राजनीतिक सफर उपलब्धियों से भरपूर रहा। कानपुर के विकास के लिए वह एक जुनूनी नेता रहे। 25 सितंबर 1944 को जन्मे श्रीप्रकाश जायसवाल ने राजनीति की शुरुआत पहले संगठन व फिर स्थानीय निकायों से की। कानपुर की जनता से उनका रिश्ता इतना मजबूत था कि वे 1999, 2004 और 2009—लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतते हुए राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुँचे। भाजपा का ग्राफ जरूर बढ़ रहा था, पर उनकी लोकप्रियता भी तेज गति पकड़े थी। 2014 में उनके मुकाबले भाजपा के कद्दावर नेता मुरलीमनोहर जोशी जीते जरूर थे पर उन्हें भी 2009 के चुनाव के मुकाबले ज्यादा वोट मिले था। उन्होंने तिलक हाल को मंदिर से कम नहीं समझ। उनकी चुनावी सफलता इस बात का प्रमाण थी कि जनता उन्हें नेता नहीं, अपना प्रतिनिधि और भरोसेमंद साथी मानती थी। यूपीए सरकार में उन्होंने गृह राज्य मंत्री, कोयला मंत्री, और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री सरीखे अहम पद संभाले। इन मंत्रालयों के दौरान वे कई जटिल चुनौतियों से जूझे, लेकिन उनकी शैली हमेशा शांत, तथ्यपरक और संतुलित रही। विवादों के बीच भी वे संयम बनाए रखने वाले उन दुर्लभ नेताओं में थे जिनकी प्राथमिकता कटु वाक्य नहीं, संवाद और समाधान रहा। कानपुर को औद्योगिक संकट, प्रदूषण और रोजगार की चुनौतियों से उबारने के प्रयासों में जायसवाल लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने गंगा सफाई, सड़क व रेल संपर्क, स्वास्थ्य सुविधाओं, और शैक्षिक संस्थानों के विस्तार के लिए बार-बार केंद्र व राज्य सरकारों में आवाज उठाई। श्रमशक्ति, कानपुर-नईदिल्ली शताब्दी के साथ ही कनपुर से मुंबई तक रेल से सफर को आसान बनाने उद्योग नगरी जैसी गाड़ियां चलवाईं। उनके खाते में उपलब्धियों का भंडार है। स्थानीय कार्यकर्ता बताते हैं कि उनका दरवाज़ा और फोन, दोनों आम जनता के लिए हमेशा खुले रहते थे। राजनीतिक पद चाहे जो रहा हो, उनकी उपलब्धता कभी नहीं बदली। जन-जन से जुड़े रहना तो जैसे इनका पैशन था। कोई भी याद करे जायसवाल हाज़िर।

जायसवाल का व्यक्तित्व राजनीतिक आक्रामकता का नहीं, बल्कि शांत, सहनशील और व्यवहार-केंद्रित नेतृत्व का प्रतीक था। वे विरोधियों से भी उतनी ही सहजता से बात करते थे, जितनी अपने समर्थकों से। व्यवहार में विनम्रता और शब्दों में संयम उनकी पहचान बन गई थी। तेज़ राजनीतिक ध्रुवीकरण के इस दौर में जायसवाल का जीवन यह याद दिलाता है कि राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने का खेल नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को निभाने की जिम्मेदारी भी है। उन्होंने अपने जीवन में यह साबित किया कि नेता की सबसे बड़ी शक्ति उसका व्यवहार होता है, न कि उसका पद। श्रीप्रकाश जायसवाल का जाना केवल एक अनुभवी राजनेता की कमी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की क्षति भी है जिसमें सरलता, संवाद और संतुलन सबसे बड़ी पूँजी माने जाते थे।

कानपुर और देश की राजनीति उन्हें हमेशा इसी रूप में याद रखेगी।

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