लोकप्रिय नेता श्रीप्रकाश जायसवाल पंचतत्त्व में विलीन

श्रीप्रकाश जायसवाल वह नाम, जो कानपुर की राजनीति ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का हिस्सा बन चुका था। अपने शहर के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। अपनी सादगी कनपुर के विकास के हर सम्भव कोशिश वाले नेता की पहचान बने जायसवाल का पार्थिव शरीर रविवार को भैरवघाट में पंचतत्त्व में विलीन हो गया। बड़े बेटे सिद्धार्थ जायसवाल ने मुखाग्नि दी। छोटे बेटे  गौरव जायसवाल भी अंत्येष्टि में सहयोग दे रहे थे। राजनीति में करीब साढ़े चार दशकों तक सक्रिय रहने वाले जायसवाल जी को चाहने वाले लोग सिर्फ उनकी उपलब्धियों से ही प्रभावित नहीं थे, बल्कि उस इंसानियत से भी मोहित थे जिसके कारण वे राजनीति में भी ‘घर के बड़े’ की तरह माने जाते थे। ये सभी समर्थक भारी संख्या में उपस्थित थे। उनकी अंतिम यात्रा निज निवास पोखरपुर से केनाल पटरी व फिर तिलक हाल पहुंची जहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने श्रद्धांजलि दी। 


इसके बाद भारी भीड़ के साथ भैरवघाट शवयात्रा पहुंची। इस मौके पर उमड़ा जनसैलाब उनके जीवन का मुकम्मल प्रतिबिंब था। वहाँ आए बुज़ुर्ग मजदूर हों, छोटे व्यापारी हों, कभी उनके दरवाज़े पर मदद माँगने गए छात्र हों या वे लोग जिनसे संबंध सिर्फ मुस्कुराहट का था, हर किसी की आँखें नम थीं।

 लोग बार-बार बस इतना ही कह रहे थे, “जायसवाल जी सुन लेते थे… भले वह काम कर पाते या नहीं, पर सुनते सबकी थे।” श्रीप्रकाश जायसवाल अपने दौर के उन नेताओं में थे जिनके लिए राजनीति पेशा नहीं, ज़िम्मेदारी थी। मेयर व तीन बार सांसद, केंद्र में दो बार मंत्री रहे जायसवाल कांग्रेस संगठन में गणेश शंकर विद्यार्थी के बाद दूसरे कनपुरिये थे जिन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने का गौरव हासिल हुआ। लेकिन पद की चमक ने उनके व्यवहार की सादगी को कभी धूमिल नहीं किया। लोगों का कहना था कि फ़िल्मों और साहित्य के प्रति उनका प्रेम, लोगों से घुल-मिलकर बात करने का उनका अंदाज़, और कठिन परिस्थितियों में भी शांत स्वर से समाधान निकालने की उनकी क्षमता, ये सब उन्हें ‘परंपरागत राजनेता’ की परिभाषा से अलग करता है। राजनीति में मतभेद अनिवार्य हैं, पर ऐसे व्यक्तित्व दुर्लभ हैं जिनकी विदाई पर सभी पक्ष एक स्वर में कहें, “हमें उनका होना याद आएगा।” मुख्तलिफ दलों के दिग्गजों ने उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

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