बिहार-अबकी बार किसकी सरकार?

महेश शर्मा : बिहार द्वितीय चरण के मतदान को तैयार है। मतदान प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। यू टर्न की राजनीति का आदी से हो चुका बिहार क्या कुछ नया करने की तैयारी में है? योग्यता तो है। राज्य की पॉलिटिक्स एक बार फिर करवट लेने की तैयारी में है। बिहार की राजनीति में कौन बाज़ी मारेगा? यह सवाल न केवल दलों, बल्कि आम मतदाताओं के बीच भी चर्चा का विषय है। इस बार की जंग दो परिचित ध्रुवों एनडीए और महागठबंधन के बीच सिमटी हुई दिखाई देती है, परंतु छोटे दलों का समीकरण एक बार फिर परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। जन सूरज की एंट्री से थोड़ा हलचल है। नीतीश कुमार और भाजपा का गठबंधन एक बार फिर सत्ता में वापसी की उम्मीद में मैदान में उतरा है। भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मजबूत संगठनात्मक ढांचा है, जबकि जदयू को अब भी ग्रामीण मतदाताओं, विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों का भरोसा प्राप्त है। फिर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। नीतीश कुमार की “यू-टर्न राजनीति” अब मतदाताओं में थकान पैदा कर रही है। भाजपा के युवा समर्थकों में उत्साह है, पर बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे विपक्ष के लिए हथियार बने हुए हैं। यदि दोनों दलों में सीट बंटवारा सहजता से हो गया और नाराज वोटर को साध लिया गया, तो एनडीए की राह अपेक्षाकृत आसान रह सकती है। तेजस्वी यादव नेतृत्व वाले महागठबंधन ने बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को केंद्र में रखा है। राजद का पारंपरिक मुस्लिम-यादव (एम-वाई) समीकरण अब भी उसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन जीत के लिए केवल यह काफी नहीं। अति पिछड़ी जातियों को भी तेजस्वी यादव जोड़ने में लगे हैं। तेजस्वी को गैर-यादव पिछड़े वर्गों, युवाओं और प्रथम मतदाताओं को साथ लाना होगा। कांग्रेस का जनाधार सीमित है, मगर गठबंधन को वैचारिक मजबूती देती है। वाम दलों का योगदान कुछ सीटों पर निर्णायक हो सकता है। यदि तेजस्वी बेरोजगारी और विकास के मुद्दे पर विश्वसनीयता कायम रख पाए, तो महागठबंधन सत्ता के नज़दीक पहुँच सकता है।



बिहार की राजनीति में छोटे दल हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), जीतन राम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएस जैसे दलों के पास सीमित सीटें हैं, लेकिन वोट बैंक सघन है। इन दलों का झुकाव किसी भी बड़े गठबंधन के पक्ष या विपक्ष में परिणाम को पलट सकता है।

बिहार में चुनावी राजनीति जातीय आधार पर ही घूमती रही है। यादव-मुस्लिम गठजोड़ राजद की नींव है, जबकि ऊपरी जातियों और शहरी मतदाताओं में भाजपा की पकड़ मजबूत है। नीतीश का प्रभाव कुर्मी-कोइरी और महिला मतदाताओं में अब भी कायम है। इस बार जिन दलों ने गैर-यादव पिछड़ों और दलित मतदाताओं को साध लिया, वही अंतिम बाज़ी जीत सकते हैं। इस बार चुनाव में रोजगार, शिक्षा, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे ठोस मुद्दे हावी रहेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान, सिंचाई और स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत चुनावी बहस का हिस्सा बनेगी। युवाओं का झुकाव किस ओर जाएगा यही तय करेगा कि सत्ता की कुर्सी पर कौन बैठेगा।

बिहार में मुकाबला रोमांचक और नज़दीकी रहेगा। एनडीए के पास शासन का अनुभव और संगठन की मजबूती है, जबकि महागठबंधन के पास युवाओं की उम्मीदें और बदलाव का संदेश। परिणाम अंततः इस बात पर निर्भर करेगा कि जनता “स्थिरता” को चुनती है या “परिवर्तन” को। बिहार का इतिहास गवाह है कि यहाँ की जनता आख़िरी क्षण में भी राजनीति की दिशा बदल देती है। इस बार भी वही होगा। निर्णय जनता का, समीकरण सबका।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं |


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