इथियोपिया के ज्वालामुखी की राख का बादल भारत से कब हटेगा? चीन की ओर बढ़ रहा है राख का रुख


 इथियोपिया के हेली गुब्बी (Hale Gubbi) ज्वालामुखी से निकलने वाला विशाल राख का बादल पिछले कुछ दिनों से भारत तक फैल गया था, जिससे वायु गुणवत्ता, विमान संचालन और मौसम संबंधी निगरानी पर प्रभाव पड़ा। Indian Meteorological Department (IMD) के अनुसार, यह राख का बादल अब धीरे-धीरे भारत की सीमा से बाहर निकल रहा है और इसका रुख चीन की दिशा में मुड़ चुका है। मौसम विभाग ने बताया है कि मंगलवार शाम 7:30 बजे तक यह बादल पूरी तरह से भारत से हट जाएगा और देश में इसके प्रभाव कम हो जाएंगे।

क्या था राख के बादल का असर?

ज्वालामुखीय राख के बादल तेजी से ऊपरी वायुमंडल में फैलते हैं और हवा की दिशा के अनुसार हजारों किलोमीटर तक प्रभावित कर सकते हैं। भारत में इसके प्रवेश से कई राज्यों के ऊपर उच्च वायुमंडल में राख के कण पाए गए, जिससे कुछ क्षेत्रों में हल्का धुंध जैसा प्रभाव दिखाई दिया। हालांकि यह सतही वायु गुणवत्ता पर बहुत अधिक प्रभावकारी नहीं था, लेकिन विमानन क्षेत्र में इसकी वजह से सतर्कता बरती गई।

कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को डाइवर्ट, देरी या री-रूट करना पड़ा ताकि विमान राख के घने क्षेत्रों में न जाएं। राख के कण इंजन में प्रवेश कर विमान की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं, इसलिए एयरलाइंस ने सावधानी बरती।

राख का भारत से हटना क्यों महत्वपूर्ण है?

IMD के मुताबिक, राख का बादल भारत के वायुमंडलीय क्षेत्र में ज्यादा देर नहीं रुका। हवा की दिशा पूर्व से उत्तर-पूर्व की ओर होने के कारण यह बादल अब चीन की तरफ बढ़ रहा है। इसके हटने से—

  • उड़ानों का संचालन सामान्य हो सकेगा

  • मौसम पूर्वानुमान मॉडल अधिक सटीक होंगे

  • वायुमंडलीय दृश्यता की स्थिति बेहतर होगी

  • सतह पर प्रदूषण का संभावित खतरा कम होगा

भारत में प्रभावित राज्यों के ऊपर अब आसमान साफ़ होने की उम्मीद जताई जा रही है। राख का अधिकतम प्रभाव 10–12 किमी ऊँचाई वाले ऊपरी वायुमंडल में ही दर्ज किया गया था।

आगे क्या उम्मीद?

IMD ने कहा है कि ज्वालामुखी की गतिविधियों पर लगातार नज़र रखी जा रही है। यदि हेली गुब्बी में फिर से विस्फोट होता है या राख का नया बादल बनता है, तो उसका प्रभाव हवा की दिशा के अनुसार पड़ सकता है। अभी की स्थिति में, भारत के लिए खतरा कम है और आने वाले 24 घंटों में मौसम पूरी तरह सामान्य रहने की संभावना है।

ज्वालामुखीय राख वैश्विक वायु मार्गों और मौसम विज्ञान दोनों पर असर डालती है। ऐसे में भारत से इसका हटना यात्रियों और मौसम सेवाओं दोनों के लिए राहत लेकर आया है।

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