शेख हसीना का बड़ा बयान: ‘भारत के प्रति यूनुस की दुश्मनी आत्मघाती’, बांग्लादेश लौटने की रखी शर्त


 बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना ने देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनके बांग्लादेश लौटने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त सहभागी लोकतंत्र (Participatory Democracy) की बहाली है। हसीना का कहना है कि जब तक देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता की भागीदारी पूरी तरह से बहाल नहीं होती, तब तक उनके वापस लौटने की संभावना नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि बांग्लादेश में वर्तमान में चल रही अंतरिम सरकार की नीतियां देश को अस्थिरता की ओर धकेल रही हैं। उन्होंने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उनका भारत के प्रति रवैया “बेवकूफी भरा और आत्मघाती (suicidal)” है। शेख हसीना के मुताबिक, भारत और बांग्लादेश के बीच के संबंध ऐतिहासिक, भावनात्मक और रणनीतिक हैं, जिन्हें किसी एक व्यक्ति की गलत नीतियों से तोड़ा नहीं जा सकता।

हसीना ने कहा कि बांग्लादेश की आज़ादी के संघर्ष में भारत ने जो भूमिका निभाई थी, उसे कोई भूल नहीं सकता। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने 1971 के मुक्ति संग्राम में बांग्लादेश का साथ देकर न केवल एक नया देश बनने में मदद की, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग की नींव भी रखी। यही कारण है कि भारत के साथ अच्छे संबंध रखना बांग्लादेश के हित में है।

उन्होंने कहा, “भारत हमारा पड़ोसी ही नहीं, बल्कि संघर्ष के दिनों का सच्चा साथी है। यूनुस का भारत-विरोधी रुख न केवल कूटनीतिक गलती है, बल्कि यह बांग्लादेश के भविष्य के लिए भी हानिकारक है। उनके ऐसे कदम भारत के साथ दशकों से बने विश्वास को कमजोर करने की कोशिश हैं, जो पूरी तरह मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती हैं।”

पूर्व प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि अगर बांग्लादेश में लोकतंत्र को पुनर्स्थापित किया जाता है, तो वे जल्द ही देश लौटकर जनता की सेवा करने को तैयार हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अपील की कि वे बांग्लादेश में निष्पक्ष और पारदर्शी राजनीतिक प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाए रखें।

हसीना ने अंत में कहा कि बांग्लादेश की स्थिरता, शांति और प्रगति भारत के साथ मजबूत रिश्तों पर निर्भर करती है। “भारत और बांग्लादेश के संबंध किसी भी अस्थायी राजनीतिक अंतराल के बावजूद टिके रहेंगे, क्योंकि इन रिश्तों की जड़ें जनता के दिलों में हैं

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