राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर देशभर में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में वर्षभर चलने वाले स्मरणोत्सव का शुभारंभ करेंगे। इस कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री स्मारक डाक टिकट और स्मारक सिक्का भी जारी करेंगे, ताकि इस गौरवशाली विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक विशेष रूप से पहुंचाया जा सके।
7 नवंबर 1874: अक्षय नवमी पर हुआ था सृजन
वंदे मातरम् की रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय (1858–1894) ने 7 नवंबर 1874 को अक्षय नवमी के शुभ दिन की थी। मूलतः यह गीत संस्कृत और बंगला के सम्मिश्रण में लिखा गया, जिसकी छंद-शैली में भारतीय संस्कृति, प्रकृति, मातृभूमि और आध्यात्मिक शक्ति—सभी का सौंदर्य झलकता है।
हालांकि गीत को बाद में बंकिमचंद्र ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया, लेकिन इसकी लोकप्रियता इससे पहले ही आम जनमानस में गूंजने लगी थी।
इतिहास में ‘वंदे मातरम्’ की अमर भूमिका
यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन की भावनात्मक धुरी बन गया था। क्रांतिकारी यात्राओं, सभाओं और प्रदर्शनों में यह उद्घोष भारतीयों की हिम्मत और संकल्प को बढ़ाता रहा।
‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता सेनानियों के लिए धर्म, साहस और बलिदान का मंत्र बन गया था।
लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, अरविंदो घोष जैसे नेताओं ने इसे भारत की राष्ट्रीय चेतना की आवाज कहा।
1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इसे सुर देकर पहली बार प्रस्तुत किया, जिसके बाद यह पूरे देश में राष्ट्र-जागरूकता का प्रतीक बन गया।
भारत का राष्ट्रगीत कैसे बना?
स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा के सदस्यों ने इस गीत की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्ता को मान्यता दी और
1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान मिला।
विशेष रूप से इसकी पहली दो पंक्तियाँ, जो मातृभूमि और प्रकृति महिमा का अद्भुत वर्णन करती हैं, आज आधिकारिक राष्ट्रगीत का हिस्सा हैं।
आज भी उतना ही प्रासंगिक
150 वर्षों बाद भी वंदे मातरम्
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भारत के स्वाभिमान
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राष्ट्रीय एकता
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और मातृभूमि के प्रति समर्पण
का सबसे प्रभावी प्रतीक है।
यह गीत हमें यह याद दिलाता है कि आजादी सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर रूप से जीया जाने वाला राष्ट्रधर्म है।
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