राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की एकता और राष्ट्रीय गौरव पर जोर देते हुए बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि 1937 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के दौरान जिन विचारों के आधार पर ‘वंदे मातरम्’ को राजनीतिक रूप से किनारे किया गया, उन विभाजनकारी सोच के बीज वहीं बो दिए गए थे। आज स्वतंत्रता के 77 साल बाद भी वही मानसिकता भारत के लिए चुनौती बनी हुई है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता संग्राम की धड़कन रहा है। इसने लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर राष्ट्रभक्ति की आग जगाई और अंग्रेज़ों के खिलाफ जन-आंदोलन को मजबूत किया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला वह स्वाभिमान था, जिसने भारतवासियों को अखंड भारत के सपने के लिए प्रेरित किया।
“भारत मानवता की सेवा में कमला, आतंक के विनाश में दुर्गा”
अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज जब भारत विश्व मंच पर नई पहचान बना रहा है, तब देश का चरित्र मानवता और शक्ति—दोनों रूप में दिखाई देता है। उनके शब्दों में—
“जब दुश्मन ने आतंक के जरिए भारत की सुरक्षा और सम्मान पर हमला करने का दुस्साहस किया, तो पूरी दुनिया ने देखा— नया भारत मानवता की सेवा के लिए कमला और विमला का स्वरूप है, तो आतंक के विनाश के लिए दुर्गा भी बनना जानता है।”
उन्होंने कहा कि भारत शांति का उपदेश देने में विश्वास रखता है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आधुनिक भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रवादी मूल्यों पर गर्व करते हुए आगे बढ़ रहा है।
वंदे मातरम्: संस्कृति और राष्ट्रभाव का प्रतीक
कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि आने वाली पीढ़ी को वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से अवगत कराना आवश्यक है। उन्होंने इसे भारत की अभेद्य एकता, विविधता और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक बताया।
अपने भाषण के अंत में पीएम मोदी ने नए भारत के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि देश अब किसी भी विभाजनकारी विचारधारा को अपने आगे दीवार की तरह खड़ा नहीं होने देगा।
“भारत एक है, भारत महान है— और वंदे मातरम् की भावना से ही हम विश्वगुरु बनने के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।”
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