राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में गौरव और राष्ट्रभक्ति की भावना से भरे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत सिर्फ शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि भारत की आजादी के संघर्ष का प्राण-स्वर रहा है। यह गीत मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है और आज भी देशवासियों की भावनाओं में बसे हुए है।
कहां से शुरू हुआ सफर?
बंकिमचंद्र ने यह गीत 1875 में लिखा और बाद में इसे अपनी ऐतिहासिक उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया। उस समय भारत अंग्रेज़ी शासन के दमनकारी दौर से गुजर रहा था और देश को एक ऐसी प्रेरणा की जरूरत थी, जो स्वतंत्रता का सपना जीवित रख सके।
वंदे मातरम् ने ठीक वही किया — यह हर भारतीय में मां भारती के प्रति भक्ति और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना को प्रज्वलित करता गया।
बंगदर्शन पत्रिका से शुरुआत
गीत पहली बार बंगदर्शन नामक बंगाली पत्रिका में प्रकाशित हुआ। देखते ही देखते यह गीत जन-जन के हृदय में जगह बनाने लगा और इसी वजह से इसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान
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रैलियों में
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सभाओं में
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क्रांतिकारियों के नारों में
मुख्य रूप से अपनाया गया। यह गीत अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने की शक्ति देता था।
स्वतंत्रता संग्राम का ऊर्जा स्त्रोत
लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, अरविंदो घोष, सुभाष चंद्र बोस जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने वंदे मातरम् को आंदोलन का धर्म और प्रण बताया। यह गीत युवाओं के लिए प्रेरणा और क्रांतिकारियों के लिए शक्ति का स्रोत बन गया।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार इसे सुर देकर गाया। उसके बाद तो यह पूरे देश का राष्ट्रगीत बन चुका था— भले ही आधिकारिक घोषणा बाद में हुई।
राष्ट्रगीत का दर्जा
स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा में चर्चा के बाद 1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। इसकी पहली दो पंक्तियों को आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई।
ये पंक्तियाँ
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भारत माता की छवि
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प्रकृति की समृद्धि
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मातृभूमि के प्रति सम्मान
की दिव्य अभिव्यक्ति मानी जाती हैं।
आज भी वही ऊर्जा, वही श्रद्धा
150 वर्षों बाद भी वंदे मातरम् की गरिमा कम नहीं हुई—
यह गीत आज भी नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, त्याग और एकता के मूल्यों से जोड़ता है।
इसीलिए कहा जाता है—
वंदे मातरम् सिर्फ गाया नहीं जाता, जिया जाता है।
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