श्रद्धांजलि-मूछों से मुहब्बत करते थे पंकज धीर

महेश शर्मा : बीआर चोपड़ा के महाभारत सीरियल में कर्ण का सामाजिक न्याय और दानवीर का जीवंत रोल निभाने वाले पंकज धीर को कैंसर लील गया। उनके विषय में मशहूर है कि उन्होंने अपनी मूछों से कभी समझौता नहीं किया। एक बार तो कर्ण का रोल ब्यहि ठुकरा दिया था। यह किस्सा कुछ यूं था इस रोल के लिए सारी परीक्षाएं पास कर चुके पंकज धीर से जब बीआर चोपड़ा ने कहा कि पंकज तुम मूसद मुड़ा लेना, कर्ण के रोल के लिए तुम्हे सिलेक्ट कर लिया गया। पंकज ने उनसे अनुरोध किया कि मूछ उन्हें बहुत प्यारी हैं। वह योद्धा का अभिनय कर लेंगे। पर चोपदानहीँ माने। पंकज धीर निराश हुए पर हताश नहीं। उन्होंने मैन लिया कि यह रोल उन्हें अब नहीं मिलेगा। लेकिन उन्हें यह भी विश्वास था कि उनके जैसा इस रोल के लिए उनके जैसा दूसरा कलाकार मिलना मुश्किल होगा। वही हुआ भी। चोपड़ा साब ने उन्हें बुलाया। बाद कमाल साबने छोटे पर्दे पर देख ही लिया। पंकज धीर ने अपने करियर की शुरुआत 1980 के दशक की फिल्मों से की।प्रारंभिक दौर में उन्होंने कर्मा, सोल्जर, तहकीकात जैसी फिल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं। लेकिन उन्हें असली पहचान बी.आर. चोपड़ा के प्रसिद्ध धारावाहिक “महाभारत” (1988) से मिली, जिसमें उन्होंने कर्ण की भूमिका निभाई थी। 
कर्ण महाभारत के सबसे जटिल और भावनात्मक पात्रों में से एक था। वह कुंतीपुत्र होकर भी सूतराज कहलाया और जीवनभर सम्मान की तलाश में रहा। पंकज धीर ने इस पात्र के गौरव, करुणा, त्याग, और आत्मसम्मान को बेहद सजीव कर दिया। उनके संवादों में दर्द और गरिमा का ऐसा संतुलन था कि दर्शक आज भी उन्हें “टीवी का कर्ण” कहते हैं। कुछ डायलॉग पर नजर डालिए। “दानवीर कर्ण कभी भी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता।” “मैं सूरज का पुत्र हूँ, किसी की दया पर नहीं जीता।” अन्य धारावाहिक और फिल्में टीवी: चंद्रकांता, हर हर महादेव, दीया और बाती हम, बंधन, कर्मफल दाता शनि आदि। फिल्में: ताल, सोल्जर, बॉर्डर, बाहुबली: द बिगिनिंग (विशेष भूमिका), सन ऑफ सरदार, तीस मार खान आदि। पंकज धीर ने “मायएक्टर्सहब (My Actors Hub)” नाम से एक अभिनय प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की, जहाँ नए कलाकारों को प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्होंने कुछ शॉर्ट फिल्मों और धारावाहिकों का निर्देशन भी किया है। उनके पुत्र निकितिन धीर ने चेन्नई एक्सप्रेस, डब्बा, शेरशाह जैसी फिल्मों में काम किया है। “महाभारत” के प्रसारण के बाद लोग पंकज धीर को सड़कों पर “कर्ण महाराज” कहकर पुकारते थे। शूटिंग के दौरान उन्होंने अपने संवाद खुद याद करके बेहद गंभीरता से निभाए, जिससे डॉ. राही मासूम रज़ा भी प्रभावित हुए थे। पंकज धीर ने कहा था, 'कर्ण मेरा सिर्फ रोल नहीं था, वह मेरा भावनात्मक अनुभव था।' बी.आर. चोपड़ा ने बाद में कहा था , “अगर कर्ण की जगह कोई और होता, तो महाभारत अधूरी लगती।”
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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