मुस्लिम देशों पर नेतृत्व की महत्वाकांक्षा
तुर्किए लंबे समय से खुद को मुस्लिम देशों का नेतृत्वकर्ता मानने की कोशिश करता रहा है। राजनीतिक और धार्मिक मंचों पर तुर्की सरकार ने अक्सर इस्लामी एकजुटता पर जोर दिया है। लेकिन ताज़ा सर्वे ने एक अलग तस्वीर सामने रखी है, जिसने सबको चौंका दिया है।
सर्वे की चौंकाने वाली रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार, तुर्किए में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जिन्होंने इस्लाम धर्म को छोड़ दिया। खासतौर पर युवा पीढ़ी में यह रुझान देखने को मिला है। शिक्षा, आधुनिक सोच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह इस बदलाव के पीछे बड़ी वजह बताई जा रही है।
इंडोनेशिया की स्थिरता
दूसरी ओर, दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया की स्थिति अलग है।
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यहां 93% आबादी इस्लाम का पालन करती है
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न तो बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुआ है और न ही लोग इस्लाम छोड़ रहे हैं
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इसलिए मुस्लिम जनसंख्या में स्थिरता बनी हुई है
तुर्किए और इंडोनेशिया का अंतर
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तुर्किए: यहां धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक विचारधाराओं के बीच खींचतान तेज है। इसी वजह से कुछ लोग इस्लाम छोड़कर नास्तिकता या अन्य विचारधाराओं की ओर जा रहे हैं।
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इंडोनेशिया: यहां समाज और सरकार दोनों स्तर पर धार्मिक परंपराएं स्थिर बनी हुई हैं।
मुस्लिम वर्ल्ड पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्किए में यह रुझान मुस्लिम वर्ल्ड की राजनीति और समाज पर असर डाल सकता है। अगर यह ट्रेंड आगे बढ़ा तो तुर्किए की "मुस्लिम देशों का आका बनने" की महत्वाकांक्षा कमजोर पड़ सकती है।
निचोड़
सर्वे की यह रिपोर्ट साफ दिखाती है कि जहां इंडोनेशिया में इस्लाम की स्थिति स्थिर है, वहीं तुर्किए में धर्म छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह बदलाव न केवल तुर्किए की आंतरिक राजनीति बल्कि मुस्लिम वर्ल्ड की लीडरशिप डाइनामिक्स को भी प्रभावित कर सकता है।
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