संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 80वें सत्र में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो (Prabowo Subianto) का संबोधन एकता और विविधता का अनोखा संदेश लेकर आया। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत पारंपरिक इस्लामी अभिवादन से की और समापन बहुधार्मिक प्रार्थना के साथ किया। उनके इस संदेश ने न केवल इंडोनेशिया की बहुसांस्कृतिक पहचान को दर्शाया, बल्कि पूरी दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व का संदेश भी दिया।
शुरुआत इस्लामी अभिवादन से
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए राष्ट्रपति सुबियांतो ने कहा, "वस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाही वबरकातुह"। यह अभिवादन मुस्लिम परंपरा का हिस्सा है और इसमें शांति, दया और आशीर्वाद की भावना समाहित होती है। इससे उन्होंने दुनिया के सभी मुस्लिम समुदायों को संबोधित करते हुए भाईचारे और सद्भाव का संकेत दिया।
समापन में बहुधार्मिक संदेश
भाषण के अंत में राष्ट्रपति सुबियांतो ने विभिन्न धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए कहा,
"शालोम, ओम शांति शांति शांति ओम, नमो बुद्धाय"।
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"शालोम" यहूदी और ईसाई परंपराओं में शांति का अभिवादन है।
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"ओम शांति शांति शांति ओम" हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति में शांति की कामना को दर्शाता है।
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"नमो बुद्धाय" बौद्ध परंपरा में करुणा और शांति का संदेश देता है।
इन शब्दों ने उनके संबोधन को विशेष बना दिया और वैश्विक मंच पर धार्मिक समन्वय का उदाहरण पेश किया।
इंडोनेशिया की धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक
इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन यहां ईसाई, हिंदू, बौद्ध और अन्य धर्मों के लोग भी शांति और सद्भाव के साथ रहते हैं। राष्ट्रपति सुबियांतो का यह कदम इंडोनेशिया की उसी सांस्कृतिक विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक था। उन्होंने अपने देश की बहुलवादी पहचान को गर्व से प्रस्तुत किया और संदेश दिया कि विविधता ही असली ताकत है।
वैश्विक स्तर पर संदेश
राष्ट्रपति के इस अभिवादन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर एक गहरा संदेश छोड़ा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक चुनौतियों – चाहे वह युद्ध हो, जलवायु संकट हो या असमानता – का समाधान केवल शांति, आपसी सम्मान और सहयोग से ही संभव है। उनकी बहुधार्मिक प्रार्थना ने विश्व नेताओं को याद दिलाया कि संस्कृतियों और धर्मों की विविधता को बाधा नहीं, बल्कि आपसी विकास और शांति की राह माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा में राष्ट्रपति सुबियांतो का यह संबोधन केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदेश था। "ओम शांति शांति शांति ओम" जैसी प्रार्थना का उच्चारण विश्व शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और धार्मिक सद्भावना का प्रतीक बन गया।

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