मुख्य आर्थिक सलाहकार ने दिया साफ जवाब
अमेरिका और भारत के बीच बढ़ते टैरिफ विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेन-देन के लिए अमेरिकी डॉलर के विकल्प की तलाश कर रहा है। इस मुद्दे पर भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंथ नागेश्वरन ने अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है।
"डॉलर का विकल्प अभी व्यावहारिक नहीं"
नागेश्वरन ने कहा कि इस समय अमेरिकी डॉलर का कोई व्यावहारिक विकल्प मौजूद नहीं है। उन्होंने साफ किया कि हालांकि कई देश डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में सोच रहे हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर उसकी जगह लेने वाली मुद्रा या प्रणाली अभी तैयार नहीं है।
डॉलर की मजबूती का कारण
CEA के मुताबिक, डॉलर की ताकत केवल उसकी वैल्यू में नहीं, बल्कि अमेरिकी वित्तीय बाजारों की गहराई और स्थिरता में है। दुनिया भर में लेन-देन और रिज़र्व करेंसी के तौर पर डॉलर की स्वीकार्यता इतनी व्यापक है कि निकट भविष्य में इसे बदलना आसान नहीं होगा।
भारत की रणनीति
भारत ने हाल के वर्षों में रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में कदम जरूर उठाए हैं। रूस जैसे देशों के साथ कुछ लेन-देन स्थानीय मुद्रा में करने की पहल भी हुई है। इसके बावजूद, नागेश्वरन का मानना है कि ये प्रयास सीमित स्तर पर ही संभव हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर का वर्चस्व जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है।
वैश्विक संदर्भ
कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि चीन की युआन या यूरो जैसी करेंसी डॉलर के विकल्प के रूप में उभर सकती हैं। लेकिन इन मुद्राओं के सामने भी भरोसा, स्थिरता और पारदर्शिता जैसी चुनौतियां हैं। नागेश्वरन ने कहा कि किसी भी विकल्प को उभरने में दशकों लग सकते हैं।
निष्कर्ष
भारत फिलहाल डॉलर का विकल्प तलाशने की बजाय अपनी आर्थिक मजबूती और निर्यात क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। नागेश्वरन का संदेश साफ है – डॉलर का वर्चस्व निकट भविष्य में चुनौती देना मुश्किल है, इसलिए भारत को दीर्घकालिक तैयारी करनी होगी।
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