भारत के पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार, हर हिंदू मास में प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि की प्रदोष काल में दो बार आता है: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में। आश्विन मास भी इससे अलग नहीं है। इस वर्ष आश्विन मास 8 सितंबर 2025 से प्रारंभ होकर 7 अक्टूबर 2025 तक चलेगा।
तो प्रश्न यह उठता है: आश्विन मास का अंतिम प्रदोष व्रत कब होगा? वर्तमान उपलब्ध पंचांगों के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर को शुरू होकर 19 अक्टूबर की शाम तक चलेगी। इस तिथि पर शाम की गोधूलि बेला में यानी सूर्यास्त के बाद के समय प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना की जाएगी।
पूजा विधि और शुभ मुहूर्त:
व्रतिष्ठ लोग सुबह स्नान के बाद शुद्ध व सात्विक भोजन से अपना दिन प्रारंभ करेंगे।
शाम को सूर्यास्त के पूर्व तथा ठीक बाद प्रदोष काल शुरू होगा, जब वातावरण शांत और गोधूलि की बेला विधि विधान से पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है।
शिवलिंग अभिषेक, बेलपत्र, धूप‑दीप, गाय के दूध, गेंद्र, फल फूल अर्पित किए जाएंगे। भक्त मन्नत मांगेंगे, मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करेंगे।
आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व:
प्रदोष व्रत को शिव भक्ति का विशेष अवसर माना जाता है। इस व्रत के पूजन से कहा जाता है कि व्यक्ति के जीवन से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति मिलती है, और जीवन में सुख, ऐश्वर्य व सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
विशेष रूप से अंतिम प्रदोष व्रत एक मास के समापन की ओर इशारा करता है यह अवसर समापन और आरंभ की ऊर्जा लेकर आता है जहाँ भक्त ये विचार करता है कि जो कुछ इस मास में अच्छा हुआ, उसका धन्यवाद हो और जो कमियाँ रह गई हों, उनसे सीख लेकर आगे बढ़ा जाए।
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