कैंसर का बढ़ता खतरा: बार-बार होने वाली जांचें ही बन रही बीमारी की वजह


 हालिया रिपोर्ट में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि थायरॉइड कैंसर (Thyroid Cancer) के मामले दुनियाभर में खासकर युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह खतरा केवल जीवनशैली या आनुवांशिक कारणों से ही नहीं, बल्कि बार-बार किए जाने वाले एक्स-रे और सीटी स्कैन जैसी डायग्नोस्टिक जांचों से भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन रेडियोलॉजिकल जांचों से निकलने वाली रेडिएशन लंबे समय में कैंसर का बड़ा कारण बन सकती है।

महिलाओं और बच्चों पर ज्यादा खतरा

रिपोर्ट में बताया गया है कि थायरॉइड कैंसर का जोखिम महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है। इसके पीछे हार्मोनल असंतुलन, शरीर की संवेदनशीलता और प्रजनन संबंधी कारक अहम भूमिका निभाते हैं। खासतौर पर प्रजनन आयु की महिलाएं और छोटे बच्चे रेडिएशन की चपेट में ज्यादा आते हैं, क्योंकि उनके शरीर पर इसके असर का प्रभाव गहरा और लंबा होता है।

जांचें क्यों बढ़ा रही हैं खतरा?

सीटी स्कैन और एक्स-रे जैसे टेस्ट मेडिकल साइंस में बहुत उपयोगी माने जाते हैं। ये डॉक्टरों को सही डायग्नोसिस करने और मरीज की स्थिति समझने में मदद करते हैं। लेकिन इनसे निकलने वाली आयोनाइजिंग रेडिएशन कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती है। अगर बार-बार और अनावश्यक रूप से ये जांचें कराई जाएं, तो डीएनए डैमेज बढ़कर कैंसर का रूप ले सकता है।

युवाओं में तेजी से बढ़ रहे मामले

विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में 20 से 40 वर्ष की आयु के लोगों में थायरॉइड कैंसर के केस तेजी से बढ़े हैं। इसका एक कारण हेल्थ चेकअप और डायग्नोस्टिक जांचों का अत्यधिक प्रयोग भी है। पहले जहां इस बीमारी को मध्यम या अधिक उम्र से जोड़कर देखा जाता था, वहीं अब यह युवा पीढ़ी को भी प्रभावित कर रही है।

क्या है बचाव के उपाय?

  • डॉक्टर की सलाह के बिना बार-बार एक्स-रे या सीटी स्कैन न कराएं।

  • जरूरत पड़ने पर अल्टरनेटिव डायग्नोस्टिक तकनीक जैसे अल्ट्रासाउंड या एमआरआई का इस्तेमाल करें, जिनमें रेडिएशन नहीं होता।

  • थायरॉइड हेल्थ को बेहतर रखने के लिए संतुलित आहार और आयोडीन का पर्याप्त सेवन करें।

  • परिवार में थायरॉइड कैंसर का इतिहास हो तो नियमित चेकअप जरूर कराएं, लेकिन अनावश्यक रेडियोलॉजी टेस्ट से बचें।

निचोड़

यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि आधुनिक जांच तकनीकें एक ओर जहां जीवन बचाने में मददगार हैं, वहीं उनका अत्यधिक प्रयोग खुद बीमारी का कारण भी बन सकता है। इसलिए मरीज और डॉक्टर दोनों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

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