भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती मिली है। दोनों देशों ने ऐसी अत्याधुनिक स्टेल्थ (Stealth) तकनीक पर सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है, जिससे भारतीय युद्धपोतों की रडार पर पहचान करना दुश्मनों के लिए पहले से कहीं अधिक मुश्किल हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत-जापान रक्षा साझेदारी में 'नया अध्याय' बताया है।

इस समझौते के तहत भारत को ऐसी तकनीक और विशेषज्ञता मिलेगी, जो युद्धपोतों के रडार क्रॉस सेक्शन (Radar Cross Section) को कम करने में मदद करेगी। आसान भाषा में कहें तो इससे भारतीय नौसेना के जहाज दुश्मन के रडार पर कम दिखाई देंगे या उनकी पहचान करना काफी कठिन हो जाएगा। यही वजह है कि इसे 'निंजा डील' कहा जा रहा है।

स्टेल्थ तकनीक आधुनिक नौसैनिक युद्ध में बेहद अहम मानी जाती है। यह युद्धपोतों के डिजाइन, विशेष कोटिंग और उन्नत सामग्री की मदद से रडार सिग्नल को कम परावर्तित करती है। नतीजतन, दुश्मन के रडार सिस्टम को जहाज की सही लोकेशन और गतिविधियों का पता लगाने में अधिक कठिनाई होती है। इससे नौसेना को निगरानी, गश्त और सैन्य अभियानों के दौरान रणनीतिक बढ़त मिलती है।

भारत पहले से ही स्वदेशी युद्धपोतों में स्टेल्थ तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन जापान के साथ यह सहयोग इस क्षमता को और मजबूत करेगा। इससे भविष्य में बनने वाले भारतीय युद्धपोत अधिक आधुनिक, सुरक्षित और दुश्मन की निगरानी से बचने में सक्षम हो सकेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर चुनौतियां बढ़ रही हैं। चीन लगातार अपनी नौसैनिक ताकत का विस्तार कर रहा है, जबकि हिंद महासागर और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में उसकी गतिविधियां भी बढ़ी हैं। ऐसे में भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस साझेदारी का उद्देश्य केवल तकनीक का आदान-प्रदान ही नहीं, बल्कि रक्षा अनुसंधान, संयुक्त विकास और समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाना भी है। इससे भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता मजबूत होगी और समुद्र में उसकी रणनीतिक बढ़त बढ़ेगी।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, स्टेल्थ क्षमता से लैस युद्धपोत किसी भी नौसेना के लिए बड़ा रणनीतिक हथियार होते हैं। ये दुश्मन की निगरानी से बचते हुए मिशन को अधिक प्रभावी ढंग से अंजाम दे सकते हैं। भारत-जापान के बीच हुआ यह समझौता आने वाले वर्षों में भारतीय नौसेना को नई तकनीकी ताकत देने के साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की सुरक्षा साझेदारी को भी नई ऊंचाई पर पहुंचा सकता है